Wednesday, September 17, 2014

श्री हनुमानचालीसा



दोहा 
श्रीगुरू चरण सरोज रज
निज मनु मुकुरू सुधारि |
बरनउँ रघुबर बिमल जसु
जो दायकु फल चारि ||
बुदिध्हीन  तनु जानिके ,
सुमिरौ पवन कुमार |
बल  बुद्धि विघा देहू मोहि ,
हरहु कलेस बिकार ||
                                                                    
चौपाई 
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर |
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ||
राम दूत अतुलित बल धामा |
अंजनी -पुत्र  पवन सूत नामा ||
महाबीर विक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के संगी ||
 कंचन  बरन  बिराज सुबेसा |
कानन कुंडल कुंचित केसा ||
 हाथ बज्र ओ ध्वजा बिराजे |
काँधे मूँज जनेऊ साजै ||
संकर सुवन केसरी नंदन |
तेज प्रताप महा जग बंदन ||
बिद्यावान गुनी अति चातुर|
राम काज करिबे को आतुर ||
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया |
राम लषन सीता मन बसिया |
सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा |
बिकट रूप धरि लंक जरावा ||
भीम रूप धरि असुर संहारे |
रामचन्द्र के काज संवारे
लाय सजीवन लखन जियाजे |
श्री रघुबीर हरषि उर लाये ||
रघुपति किन्ही बहुत बड़ाई |
तुम मम प्रिय भरतही सम भाई ||
शस बदन तुम्हरो जस गावै |
अस कहि श्रीपति कंठ लगावें||
सनकादिक ब्रम्हादि मुनीसा |
नारद सारद सहित अहीसा ||
जम कुबेर दिगपाल जहां ते |
कबि कोबिद कहि सके कहा ते ||
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा|
राम मिलायराज पद दीन्हा ||
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना|
लंकेस्वर भए सब जग जाना ||
जग सहस्त्र जोजन  पर भानू |
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ||
प्रभु  मुद्रिका मिली मुख माहि |
जलधि लाँघि गये अचरज नाही ||
दुर्गम काज जगत के जेते |
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ||
राम दुआरे तुम रखवारे |
होता  न आज्ञा बिनु पैसारे ||
सब सुख लहै तुम्हारी सरना |
तुम रच्छक कहू को डर ना |
आपन तेज सम्हारो आपै |
तीनो लोक हांकते कांपे ||
भूत पिसाच निकट नही आवै |
महावीर जब नाम सुनावै ||
नासै रोग शै सब पीरा |
जपत निरंतर हनुमत बीरा ||
संकट ते हनुमान  छुड़ावै |
मन कर्म वचन ध्यान जो लावै ||
सब पर राम तपस्वी राजा |
तीन के काज सकल तुम सजा ||
और मनोरथ जो कोई लावै |
सोइ  अमित जीवन फल पावै ||
चारो जग प्रताप तुम्हारा |
है प्रसिद्ध जगत उजियारा ||
साधु संत के तुम रखवारे |
असुर निकंदन राम दुलारे ||
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता |
अस बर दिन जानकी माता ||
राम रसायन तुम्हरे पासा |
सदा रहो रघुपति के दासा ||
तुम्हारे भजन राम को पावै |
जन्म जन्म के दुःख बिसरावै ||
अंत काल सघुबर पर जाई |
जहां जन्म हरि- भक्त कहाई||
और देवता चित न धरि  |
हनुमत सेइ सब सुख करें ||
संकट कटै मिटै सब पीरा |
जो सुमिरै हनुमत  बलवीरा ||
जै जै जै हनुमान गोसाई |
कृपा करहु गुरू देव की नाई ||
जो सत बार पाठ कर कोई |
छूटहि बंदी महा सुख होई||
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा |
होय सिद्धि साखी गौरीसा ||
तुलसीदास सदा हरि चेरा |
कीजै नाथ ह्रदय मन डेरा ||

दोहा
पवनतनय संकट हरन ,
मंगल मूर्ती रूप |
राम लखन सीता सहित ,
ह्रदय बसहु सुर भूप ||

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