Saturday, April 18, 2015

श्री दुर्गाजी की आरती

जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
तुमको निश-दिन ध्यावत हरि-- ब्रम्हा -शिवजी || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
मांग सिन्दूर विराजत टीको मृगमदको |
उज्जवल से दोऊ नैना चन्द्रबदन निको || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै |
रक्त पुष्प गलेमाला कण्ठन पर साजै ||  जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
केहरि -वाहन राजत खड़ग्-खप्पर धारी |
सुर- नर -मुनि -जन सेवत, तिनके दुःख हारी || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
कानन कुण्डल शोभित  नासाग्रे मोती |
कोटिक चन्द्र दिवाकर सम राजत ज्योति || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
शुंभ -निशुंभ विडारे महिषासुर -धाती |
धूम्रविलोचन नैना निशि -दिन मदमाती || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
चण्ड मुण्ड संहारे , शोणित -बीज हरे |
मधु -कैटभ  दोउ मारे ,सुर भय हिन करे || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
ब्रहाणी ,रूद्राणी तुम कमला रानी |
आगम -निगम बखानी तुम शिव पटरानी || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
चौसठ योगनी गावत , नृत्य करत भैरव |
बाजत ताल मृदंगा और बाजत डमरू || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
तू ही जग की माता तुम ही हो भरता|
भक्तन की दुःख हरता,सुख सम्पति -करता || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
भुजा चार अति शोभित खड्ग -खप्पर धारी |
मनवांछित पहल पावत, सेवत नर -नारी || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती |
श्री माल केतु में राजत कोटि रतन ज्योति ||
दोहा --- श्री अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावे |
           कहत शिवानंद स्वामी , सुख सम्पति पावे ||   
 

Tuesday, April 14, 2015

आरती ॐ जय जगदीश हरे

ओम जय जगदीश हरे,स्वामी जय जगदीश हरे,
भक्त जनो के संकट क्षण में दूर करे । ओम जय जगदीश हरे
जो ध्यावे फल पावे ,दुःख विनसे मन का,
सुख सम्पत्ति घर आवे ,कष्ट मिटे तन का । ओम जय जगदीश हरे
मात पिता तुम मेरे शरण गहूं किसकी,
तुम बिन ओर न दूजा,आस करूं जिसकी | ओम जय जगदीश हरे
तुम पूरण परमात्मा तुम अन्तर्यामी,
पार ब्रह्म परमेश्वर ,तुम सब के स्वामी | ओम जय जगदीश हरे
तुम करूणा के सागर ,तुम पालन कर्ता,
मैं मूरख खलकामी, कृपा करो भर्ता | ओम जय जगदीश हरे
तुम हो एक अगोचर , सबके प्राणपति ,
किस विधि मिळू दयामय , तुमको में कुमति | ओम जय जगदीश हरे
दिन बंधु दुख हरता , तुम रक्षक मेरे ,
अपने हाथ बढ़ाओ द्वार पड़ा तेरे | ओम जय जगदीश हरे
विषय विकार मिटाओ , पाप हरो देवा ,
श्रध्दा भक्ति बढ़ाओ , संतन की सेवा | ओम जय जगदीश हरे
तन मन धन जो कुछ है ,सब तेरा
तेरा तुझको अर्पित , क्या लागे मेरा |  ओम जय जगदीश हरे
ओम जय जगदीश हरे,स्वामी जय जगदीश हरे,
भक्त जनो के संकट क्षण में दूर करे । ओम जय जगदीश हरे |

Sunday, April 12, 2015

श्री सरस्वती जी की आरती

ओम जय विणे वाली मैया जय विणे वाली
ऋद्धि सिद्धि की रहती हाथ तेरे ताली
ऋषि मुनियो की बुद्धि को शुद्ध तू ही करती
स्वर्ण की भाती शुद्ध तू ही करती
 ज्ञान पिता को देती गगन शब्द से तू
विशव को उत्पन्न करती आदि शक्ति से तू
हंस वाहिनी दीजे भिक्षा दशर्न की
मेरे मन में केवल इच्छा दर्शन की
ज्योति जगाकर नित्य यह आरती जो गावे
भव सागर में दुःख में गोता न कभी खावे
 

Saturday, April 11, 2015

हनुमान जी की आरती


आरती कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ।
जाके बल से गिरवर कापे

देव पिशाच निकट नही झाके । आरती ...
लंका ऐसे समुद्र अस खाई ।
जात पवन सुत बार न लाये । आरती...
दे बीडा रघुनाथ पठाये ।
लंका जायी सिया सुधि लाये । आरती...
जगमग ज़्योति अवधपुर राजा ।
घंटा ताल पखावज बाजा ।आरती...
शक्ति बाण  लगयो ल॒क्ष्मण को
लाय संजीवनी ल॒क्ष्मण जिआये । आरती ...
पैठि पाताल तोरी यम कारे ।
अहिरावन के भुजा उखारे । आरती...
आरती कीजै जैसी तैसी ।
धुव्रा प्रहलाद विभीषण जैसी । आरती...
सुर नर मुनि जन आरती उतारे,
जय जय जय कपिराज उचारै । आरती...
बाई भुजा सुर असुर संहार
दाहिनी भुजा सब सन्त उबारे । आरती...
लंक प्रज्जवलित असुर संहारे
राजा राम के काज संवारे । आरती...
अंजनी पुत्र महा बलदायक
देव सन्त के सदा सहायक । आरती...
लंक विध्वंस किये रघुराई
तुलसीदास कपि आरती गावे । आरती...
जो हनुमानजी की आरती गावे,
बसि बेकुण्ठ अमर फल पावे । आरती...

Friday, March 20, 2015

सोलह सोमवार व्रत



॥ सोलह सोमवार व्रत विधि ॥


व्रत :-
यह व्रत सप्ताह के प्रथम दिवस सोमवार को रखा जाता है।
यह व्रत भगवान शिवजी के लिये रखा जाता है।

विधि:-
सोलह सोमवार के दिन भक्तिपूर्वक व्रत करें.

अधा  सेर गेहूं का आटा के तीन अंगा बनाकर घी, गुड़, दीप, नैवेद्य,
पूंगीफ़ल, बेलपत्र, जनेउ का जोड़ा, चंदन, अक्षत, पुष्प, आदि से प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन
करें.
एक अंगा भगवान शिव को अर्पण करें.
दो अंगाओं को प्रसाद स्वरूप बांटें, और स्वयं भी ग्रहण करें.
सत्रहवें सोमवार के दिन पाव भर गेहूं के आटे की बाटी बनाकर. घी और गुड़ बनाकर
चूरमा बनायें, भोग लगाकर उपस्थित लोगों में प्रसाद बांटें.

॥ सोलह सोमवार व्रत कथा ॥

पृथ्वी पर भ्रमण की इच्छा से भगवान शिव और पार्वतीजी अमरावती नगर में
पहुँचे। वन-उपवन और सुंदर भवनों को देखकर भगवान शिव को अमरावती नगर बहुत
अच्छा लगा। उन्होंने कुछ दिन उसी नगर में रहने के लिए कहा। पार्वती को भी
अमरावती नगर बहुत अच्छा लगा था।

उस नगर के राजा ने भगवान शिव का एक विशाल मंदिर बनवा रखा था। शिव और
पार्वती उस मंदिर में रहने लगे। एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा- ‘हे
प्राणनाथ! आज मेरी चौसर खेलने की इच्छा हो रही है।’ पार्वती की इच्छा
जानकर शिव पार्वती के साथ चौसर खेलने बैठ गए।

खेल प्रारंभ होते ही उस मंदिर का पुजारी वहाँ आ गया। पार्वती ने पुजारी
से पूछा- ‘पुजारीजी! चौसर के खेल में हम दोनों में से किसकी विजय होगी?’
उस समय शिव और पार्वती परिवर्तित रूप में थे। पुजारी ने एक पल कुछ सोचा
और झट से बोला- ‘चौसर के खेल में त्रिलोकीनाथ की विजय होगी।´ यह कहकर
पुजारी पूजा-पाठ में लग गया।

कुछ देर बाद चौसर में शिवजी की पराजय हुई और पार्वतीजी जीत गईं।
पार्वतीजी ने ब्राह्मण पुजारी के मिथ्या वचन से रुष्ट होकर उसे कोढ़ी हो
जाने का शाप दे दिया। शिव और पार्वती उस मंदिर से कैलाश पर्वत लौट गए।
पार्वती के शाप से कुछ ही देर में ब्राह्मण पुजारी का सारा शरीर कोढ़ से
भर गया। नगर के स्त्री-पुरुष उस पुजारी की परछाई से भी दूर-दूर रहने लगे।
कुछ लोगों ने राजा से पुजारी के कोढ़ी हो जाने की शिकायत की तो राजा ने
किसी पाप के कारण पुजारी के कोढ़ी हो जाने का विचार कर उसे मंदिर से
निकलवा दिया। उसकी जगह दूसरे ब्राह्मण को पुजारी बना दिया।
कोढ़ी पुजारी मंदिर के बाहर बैठकर भिक्षा माँगने लगा। कई दिन बाद
स्वर्गलोक की कुछ अप्सराएँ उस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आईं।
कोढ़ी पुजारी पर उनको बहुत दया आई। उन्होंने पुजारी से उस भयंकर कोढ़ के
बारे में पूछा। पुजारी ने उन्हें भगवान शिव और पार्वतीजी के चौसर खेलने
और पार्वतीजी के शाप देने की सारी कहानी सुनाई।
शाप की कहानी सुनकर अप्सराओं ने पुजारी से कहा कि तुम सोलह सोमवार का
विधिवत व्रत करो। तुम्हारे सभी कष्ट, रोग-विकार शीघ्र नष्ट हो जाएँगे।
पुजारी द्वारा पूजन विधि पूछने पर अप्सराओं ने कहा- ‘सोमवार के दिन
सूर्योदय से पहले उठकर, स्नानादि से निवृत्त होकर, स्वच्छ वस्त्र पहनकर,
आधा सेर गेहूँ का आटा लेकर उसके तीन अंग बनाना। फिर घी का दीपक जलाकर
गुड़, नैवेद्य, बेलपत्र, चंदन, अक्षत, फूल, पूंगीफल, जनेऊ का जोड़ा लेकर
प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करना। पूजा के बाद तीन अंगों
में एक अंग भगवान शिव को अर्पण करके शेष दो अंगों को भगवान का प्रसाद
मानकर वहाँ उपस्थित स्त्री, पुरुषों और बच्चों को बाँट देना।

इस तरह व्रत करते हुए जब सोलह सोमवार बीत जाएँ तो सत्रहवें सोमवार को एक
पाव आटे की बाटी बनाकर, उसमें घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाना। फिर भगवान
शिव को भोग लगाकर वहाँ उपस्थित स्त्री, पुरुष और बच्चों को प्रसाद बाँट
देना। इस तरह सोलह सोमवार व्रत करने और व्रतकथा सुनने से भगवान शिव
तुम्हारे कोढ़ को नष्ट करके तुम्हारी सभी मनोकामनाएँ पूरी कर देंगे। इतना
कहकर अप्सराएँ स्वर्गलोक को चली गईं।

पुजारी ने अप्सराओं के कथनानुसार विधिवत सोलह सोमवार का व्रत किया
फलस्वरूप भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका कोढ़ नष्ट हो गया। राजा ने उसे
फिर मंदिर का पुजारी बना दिया। मंदिर में भगवान शिव की पूजा करता हुआ
ब्राह्मण पुजारी आनंद से जीवन व्यतीत करने लगा।

कुछ दिनों बाद पुन: पृथ्वी का भ्रमण करते हुए भगवान शिव और पार्वती उस
मंदिर में पधारे। स्वस्थ पुजारी को देखकर पार्वती ने आश्चर्य से उसके
रोगमुक्त होने का कारण पूछा तो पुजारी ने उन्हें सोलह सोमवार व्रत करने
की सारी कथा सुनाई।

पार्वतीजी भी व्रत की बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने पुजारी से
इसकी विधि पूछकर स्वयं सोलह सोमवार का व्रत प्रारंभ किया। पार्वतीजी उन
दिनों अपने पुत्र कार्तिकेय के नाराज होकर दूर चले जाने से बहुत चिन्तित
रहती थीं। वे कार्तिकेय को लौटा लाने के अनेक उपाय कर चुकी थीं, लेकिन
कार्तिकेय लौटकर उनके पास नहीं आ रहे थे।

सोलह सोमवार का व्रत करते हुए पार्वती ने भगवान शिव से कार्तिकेय के
लौटने की मनोकामना की। व्रत समापन के तीसरे दिन सचमुच कार्तिकेय वापस लौट
आए। कार्तिकेय ने अपने हृदय-परिवर्तन के संबंध में पार्वतीजी से पूछा-
‘हे माता! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया था, जिससे मेरा क्रोध नष्ट हो गया
और मैं वापस लौट आया?’ तब पार्वतीजी ने कार्तिकेय को सोलह सोमवार के व्रत
की कथा कह सुनाई।

कार्तिकेय अपने एक ब्राह्मण मित्र ब्रह्मदत्त के परदेस चले जाने से बहुत
दुखी थे। वह वापस नहीं आ रहा था। उसको वापस लौटाने के लिए कार्तिकेय ने
सोलह सोमवार का व्रत करते हुए ब्रह्मदत्त के वापस लौट आने की कामना प्रकट
की। व्रत के समापन के कुछ दिनों के बाद मित्र लौट आया।

ब्रह्मदत्त ने लौटकर कार्तिकेय से कहा- ‘प्रिय मित्र! तुमने ऐसा कौन-सा
उपाय किया था जिससे परदेस में मेरे विचार एकदम परिवर्तित हो गए और मैं
तुम्हारा स्मरण करते हुए लौट आया?’ कार्तिकेय ने अपने मित्र को भी सोलह
सोमवार के व्रत की कथा-विधि कह सुनाई। ब्राह्मण मित्र व्रत के बारे में
सुनकर बहुत खुश हुआ। उसने भी व्रत करना शुरू कर दिया।

सोलह सोमवार व्रत का समापन करने के बाद ब्रह्मदत्त यात्रा पर निकला। कुछ
दिनों बाद ब्रह्मदत्त एक नगर में पहुँचा। नगर के राजा हर्षवर्धन की बेटी
राजकुमारी गुंजन का स्वयंवर हो रहा था। उस स्वयंवर में अनेक राज्यों के
राजकुमार आए थे। स्वयंवर में राजा हर्षवर्धन की हथिनी जिसके गले में
जयमाला डाल देगी, उसी के साथ राजकुमारी का विवाह होना था।

ब्रह्मदत्त भी उत्सुकतावश महल में चला गया। वहाँ कई राज्यों के राजकुमार
बैठे थे। तभी एक सजी-धजी हथिनी सूँड में जयमाला लिए वहाँ आई। उस हथिनी के
पीछे राजकुमारी गुंजन दुल्हन की वेशभूषा में चल रही थी। हथिनी ने
ब्रह्मदत्त के गले में जयमाला डाल दी फलस्वरूप राजकुमारी का विवाह
ब्रह्मदत्त से हो गया।

सोलह सोमवार व्रत के प्रभाव से ब्रह्मदत्त का भाग्य बदल गया। ब्रह्मदत्त
को राजा ने बहुत-सा धन और स्वर्ण आभूषण देकर विदा किया। अपने नगर में
पहुँचकर ब्रह्मदत्त आनंद से रहने लगा। एक दिन उसकी पत्नी गुंजन ने पूछा-
‘हे प्राणनाथ! आपने कौन-सा शुभकार्य किया था जो उस हथिनी ने राजकुमारों
को छोड़कर आपके गले में जयमाला डाल दी।’ ब्रह्मदत्त ने सोलह सोमवार व्रत
की सारी कहानी बता दी।

अपने पति से सोलह सोमवार का महत्व जानकर राजकुमारी गुंजन ने पुत्र की
इच्छा से सोलह सोमवार का व्रत किया। निश्चित समय पर भगवान शिव की
अनुकम्पा से राजकुमारी के एक सुंदर व स्वस्थ पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र का
नामकरण गोपाल के रूप में हुआ। दोनों पति-पत्नी सुंदर पुत्र को पाकर बहुत
खुश हुए। पुत्र ने भी माँ से एक दिन प्रश्न किया कि मैंने तुम्हारे ही घर
में जन्म लिया इसका क्या कारण है। माता गुंजन ने पुत्र को सोलह सोमवार
व्रत की जानकारी दी और कहा कि भगवान शिव के आशीर्वाद से ही मुझे तुम जैसा
गुणी व सुंदर पुत्र मिला है।

व्रत का महत्व जानकर गोपाल ने भी व्रत करने का संकल्प किया। गोपाल जब
सोलह वर्ष का हुआ तो उसने राज्य पाने की इच्छा से सोलह सोमवार का विधिवत
व्रत किया। व्रत समापन के बाद गोपाल घूमने के लिए समीप के नगर में गया।
उस नगर के राजा के महामंत्री राजकुमार के विवाह के लिए सुयोग्य वर की
तलाश में निकले थे।

राजा ने गोपाल को देखा तो बहुत प्रसन्न हुए। फिर गोपाल से उसके माता-पिता
के संबंध में बातें करके, उसे अपने साथ महल में ले गए। वृद्ध राजा ने
गोपाल को पसंद किया और बहुत धूमधाम से राजकुमारी का विवाह उसके साथ कर
दिया। सोलह सोमवार के व्रत करने से गोपाल महल में पहुँचकर आनंद से रहने
लगा।

दो वर्ष बाद राजा का निधन हो गया तो गोपाल को उस नगर का राजा बना दिया
गया। इस तरह सोलह सोमवार व्रत करने से गोपाल की राज्य पाने की इच्छा
पूर्ण हो गई। राजा बनने के बाद भी गोपाल विधिवत सोलह सोमवार का व्रत करता
रहा। व्रत के समापन पर सत्रहवें सोमवार को गोपाल ने अपनी पत्नी मंगला से
कहा कि व्रत की सारी सामग्री लेकर वह समीप के शिव मंदिर में पहुँचे।
मंगला ने पति की बात की परवाह न करते हुए सेवकों द्वारा पूजा की सामग्री
मंदिर में भेज दी। मंगला स्वयं मंदिर नहीं गई। जब गोपाल ने भगवान शिव की
पूजा पूरी की तो आकाशवाणी हुई- ‘हे राजन्! तेरी रानी मंगला ने सोलह
सोमवार व्रत का अनादर किया है। सो रानी को महल से निकाल दे, नहीं तो तेरा
सब वैभव नष्ट हो जाएगा। तू निर्धन हो जाएगा।’

आकाशवाणी सुनकर गोपाल बुरी तरह चौंक पड़ा। उसने तुरंत महल में पहुँचकर
अपने सैनिकों को आदेश दिया कि रानी मंगला को बंदी बनाकर ले जाओ और इसे
दूर किसी नगर में छोड़ आओ।´ सैनिकों ने राजा की आज्ञा का पालन तत्काल कर
दिया। मंत्रियों ने राजा से प्रार्थना की कि वे रानी को अन्यत्र न भेजें
तब राजा गोपाल ने आकाशवाणी वाली बात बताई तो वे भी भगवान शिव के प्रकोप
के भय से शांत होकर रह गए।

रानी मंगला भूखी-प्यासी उस नगर में भटकने लगी। मंगला को उस नगर में एक
बुढ़िया मिली। वह बुढ़िया सूत कातकर बाजार में बेचने जा रही थी, लेकिन उस
बुढ़िया से सूत उठ नहीं रहा था। बुढ़िया ने मंगला से कहा- ‘बेटी! यदि तुम
मेरा सूत उठाकर बाजार तक पहुँचा दो और सूत बेचने में मेरी मदद करो तो मैं
तुम्हें धन दूँगी।’

मंगला ने बुढ़िया की बात मान ली। लेकिन जैसे ही मंगला ने सूत की गठरी को
हाथ लगाया, तभी जोर की आँधी चली और गठरी खुल जाने से सारा सूत आँधी में
उड़ गया। मंगला को मनहूस समझकर बुढ़िया ने उसे दूर चले जाने को कहा।
मंगला चलते-चलते नगर में एक तेली के घर पहुँची। उस तेली ने तरस खाकर
मंगला को घर में रहने के लिए कह दिया लेकिन तभी भगवान शिव के प्रकोप से
तेली के तेल से भरे मटके एक-एक करके फूटने लगे। तेली ने मंगला को मनहूस
जानकर तुरंत घर से निकाल दिया।

भूखी-प्यासी रानी वहाँ से आगे की ओर चल पड़ी। रानी ने एक नदी पर जल पीकर
अपनी प्यास शांत करनी चाही तो नदी का जल उसके स्पर्श से सूख गया। अपने
भाग्य को कोसती हुई रानी आगे चल दी। चलते-चलते रानी एक जंगल में पहुँची।
उस जंगल में एक तालाब था। उसमें निर्मल जल भरा हुआ था। निर्मल जल देखकर
रानी की प्यास तेज हो गई। जल पीने के लए रानी ने तालाब की सीढ़ियाँ उतरकर
जैसे ही जल को स्पर्श किया, तभी उस जल में असंख्य कीड़े उत्पन्न हो गए।
रानी ने दु:खी होकर उस गंदे जल को पीकर अपनी प्यास शांत की।

दोपहर की धूप से परेशान होकर रानी ने एक पेड़ की छाया में बैठकर कुछ देर
आराम करना चाहा तो उस पेड़ के पत्ते पलभर में सूखकर बिखर गए। रानी दूसरे
पेड़ के नीचे जाकर बैठी तो उस पेड़ के पत्ते भी गिर गए। रानी तीसरे पेड़
के पास पहुँची तो वह पेड़ ही नीचे गिर पड़ा।

पेड़ों के विनाश को देखकर वहाँ पर गायों को चराते ग्वाले बहुत हैरान हुए।
ग्वाले मनहूस रानी को पकड़कर समीप के मंदिर में पुजारीजी के पास ले गए।
रानी के चेहरे को देखकर ही पुजारी जान गए कि रानी अवश्य किसी बड़े घर की
है। भाग्य के कारण दर-दर भटक रही है।

पुजारी ने रानी से कहा- ‘पुत्री! तुम कोई चिंता नहीं करो। मेरे साथ इस
मंदिर में रहो। कुछ ही दिनों में सब ठीक हो जाएगा।’ पुजारी की बातों से
रानी को बहुत सांत्वना मिली। रानी उस मंदिर में रहने लगी, लेकिन उसके
भाग्य में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

रानी भोजन बनाती तो सब्जी जल जाती, आटे में कीड़े पड़ जाते। जल से बदबू
आने लगती। पुजारी भी रानी के दुर्भाग्य से बहुत चिंतित होते हुए बोले-
‘हे पुत्री! अवश्य ही तुझसे कोई अनुचित काम हुआ है। जिसके कारण देवता
तुझसे नाराज होकर, तुझे इतने कष्ट दे रहे हैं।’ पुजारी की बात सुनकर रानी
ने अपने पति के आदेश पर मंदिर में न जाकर, शिव की पूजा नहीं करने की सारी
कथा सुनाई।

पुजारी ने कहा- ‘अब तुम कोई चिंता नहीं करो। कल सोमवार है और कल से तुम
सोलह सोमवार के व्रत करना शुरू कर दो। भगवान शिव अवश्य तुम्हारे दोषों को
क्षमा करके तुम्हारे भाग्य को बदल देंगे।’ पुजारी की बात मानकर रानी ने
सोलह सोमवार के व्रत प्रारंभ कर दिए। सोमवार को व्रत करके, विधिवत शिव की
पूजा-अर्चना करके रानी व्रतकथा सुनने लगी।

जब रानी ने सत्रहवें सोमवार को विधिवत व्रत का समापन किया तो उधर उसके
पति राजा गोपाल के मन में रानी की याद आई। गोपाल ने तुरंत अपने सैनिकों
को रानी मंगला को ढूँढकर लाने के लिए भेजा। रानी को ढूँढते हुए सैनिक
मंदिर में पहुँचे और रानी से लौटकर चलने के लिए कहा। पुजारी ने सैनिकों
से मना कर दिया और सैनिक निराश होकर लौट गए। उन्होंने लौटकर राजा को सारी
बातें बताईं।

राजा गोपाल स्वयं उस मंदिर में पुजारी के पास पहुँचे और रानी को महल से
निकाल देने के कारण पुजारीजी से क्षमा माँगी। पुजारी ने राजा से कहा- ‘यह
सब भगवान शिव के प्रकोप के कारण हुआ है। इसलिए रानी अब कभी भगवान शिव की
पूजा की अवहेलना नहीं करेगी।’ पुजारीजी ने समझाकर रानी मंगला को विदा
किया।

राजा गोपाल के साथ रानी मंगला महल में पहुँची। महल में बहुत खुशियाँ मनाई
गईं। पूरे नगर को सजाया गया। लोगों ने उस रात दिवाली की तरह घरों में
दीपक जलाकर रोशनी की। ब्राह्मणों ने वेद-मंत्रों से रानी मंगला का स्वागत
किया। राजा ने ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र और धन का दान दिया। नगर में
निर्धनों को वस्त्र बाँटे गए।

रानी मंगला सोलह सोमवार का व्रत करते हुए महल में आनंदपूर्वक रहने लगी।
भगवान शिव की अनुकम्पा से उसके जीवन में सुख ही सुख भर गए। सोलह सोमवार
के व्रत करने और कथा सुनने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और
जीवन में किसी तरह की कमी नहीं होती है। स्त्री-पुरुष आनंदपूर्वक
जीवन-यापन करते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

 

Tuesday, March 17, 2015

आंवला नवमी की कहानी


एक राजा था वो रोज सोना का आंवला  ब्राह्मण को दान करता था जिसका बाद रोज दोनों जना जीमता  | अब एक दिन राजा का बेटा बहू धन  की तिजोरी में ताला लगादियो  और पिताजी के बोल्या  कि अब तुम आवला धर्म नही कर सकोगे अब राजा रानी जंगल में जाकर बैठ  गया सात दिन हो गए जब तक आंवला दान नही करे तब तक कुछ खाये नही भगवान राधा दामोदरजी बोल्या अपन इसको सत नही रखा गा तो अपनी बात कोन मानेगा | राजा रानी के भगवान ने सपनो दियो कि तू उठ देख सोना को महल राजा सा ठाट बाट महल में सोना को आंवला अब वोतो रोज दोनो जना सोना को आंवला दान करे और प्रेम से रेवे है इधर बूह का घर में तो खाने को दाना भी नही बचा है सब बोल्या  जंगल में एक सोना को महल है वह पर राजा रानी रोज सोना को आंवलों दान करे है अब वो राजा को लड़को उसी राजा का महल में गयो और बोल्यो महल में म्हारे भी नौकरी पर रख लो  अब बेटा बहू दोनों के नौकरी पर रख लिया | एक दिन बहू से रानी बोली म्हारे निलादे व सिर धोने लगी तो बहु के आँख में से पानी गिरयो  तब रानी बोली की तू म्हारी पीठ पर आँसू क्यों गिरावे क्या बात है तू बतादे | जब वा बहू बोली  की मेरी भी सासू की पीठ पर ऐसे ही मसो थो | यो मसो देखकर |

मारी सासू माँ की याद आ गई वा भी रोज सोना को आंवलों देकर जीमती थी | वो म्हेलोग आंवलों  नही देने दियो और घर से निकाल दिया तब वे राजा रानी बोल्या की मे ही तेरा सासू सुसरा हां  तुमने म्हारे निकल दियो फिर भी म्हारी सत तो भगवान ने ही रखी है वे ही राजा रानी और बेटा बहू सब एक जगह अच्छी तरह से रहने लग्या है | राधा दामोदर  भगवान राजा रानी के टुट्या जैसे सबके टूट जो सुनता हुंकारा भरता |

Wednesday, September 17, 2014

श्री हनुमानचालीसा



दोहा 
श्रीगुरू चरण सरोज रज
निज मनु मुकुरू सुधारि |
बरनउँ रघुबर बिमल जसु
जो दायकु फल चारि ||
बुदिध्हीन  तनु जानिके ,
सुमिरौ पवन कुमार |
बल  बुद्धि विघा देहू मोहि ,
हरहु कलेस बिकार ||
                                                                    
चौपाई 
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर |
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ||
राम दूत अतुलित बल धामा |
अंजनी -पुत्र  पवन सूत नामा ||
महाबीर विक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के संगी ||
 कंचन  बरन  बिराज सुबेसा |
कानन कुंडल कुंचित केसा ||
 हाथ बज्र ओ ध्वजा बिराजे |
काँधे मूँज जनेऊ साजै ||
संकर सुवन केसरी नंदन |
तेज प्रताप महा जग बंदन ||
बिद्यावान गुनी अति चातुर|
राम काज करिबे को आतुर ||
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया |
राम लषन सीता मन बसिया |
सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा |
बिकट रूप धरि लंक जरावा ||
भीम रूप धरि असुर संहारे |
रामचन्द्र के काज संवारे
लाय सजीवन लखन जियाजे |
श्री रघुबीर हरषि उर लाये ||
रघुपति किन्ही बहुत बड़ाई |
तुम मम प्रिय भरतही सम भाई ||
शस बदन तुम्हरो जस गावै |
अस कहि श्रीपति कंठ लगावें||
सनकादिक ब्रम्हादि मुनीसा |
नारद सारद सहित अहीसा ||
जम कुबेर दिगपाल जहां ते |
कबि कोबिद कहि सके कहा ते ||
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा|
राम मिलायराज पद दीन्हा ||
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना|
लंकेस्वर भए सब जग जाना ||
जग सहस्त्र जोजन  पर भानू |
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ||
प्रभु  मुद्रिका मिली मुख माहि |
जलधि लाँघि गये अचरज नाही ||
दुर्गम काज जगत के जेते |
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ||
राम दुआरे तुम रखवारे |
होता  न आज्ञा बिनु पैसारे ||
सब सुख लहै तुम्हारी सरना |
तुम रच्छक कहू को डर ना |
आपन तेज सम्हारो आपै |
तीनो लोक हांकते कांपे ||
भूत पिसाच निकट नही आवै |
महावीर जब नाम सुनावै ||
नासै रोग शै सब पीरा |
जपत निरंतर हनुमत बीरा ||
संकट ते हनुमान  छुड़ावै |
मन कर्म वचन ध्यान जो लावै ||
सब पर राम तपस्वी राजा |
तीन के काज सकल तुम सजा ||
और मनोरथ जो कोई लावै |
सोइ  अमित जीवन फल पावै ||
चारो जग प्रताप तुम्हारा |
है प्रसिद्ध जगत उजियारा ||
साधु संत के तुम रखवारे |
असुर निकंदन राम दुलारे ||
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता |
अस बर दिन जानकी माता ||
राम रसायन तुम्हरे पासा |
सदा रहो रघुपति के दासा ||
तुम्हारे भजन राम को पावै |
जन्म जन्म के दुःख बिसरावै ||
अंत काल सघुबर पर जाई |
जहां जन्म हरि- भक्त कहाई||
और देवता चित न धरि  |
हनुमत सेइ सब सुख करें ||
संकट कटै मिटै सब पीरा |
जो सुमिरै हनुमत  बलवीरा ||
जै जै जै हनुमान गोसाई |
कृपा करहु गुरू देव की नाई ||
जो सत बार पाठ कर कोई |
छूटहि बंदी महा सुख होई||
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा |
होय सिद्धि साखी गौरीसा ||
तुलसीदास सदा हरि चेरा |
कीजै नाथ ह्रदय मन डेरा ||

दोहा
पवनतनय संकट हरन ,
मंगल मूर्ती रूप |
राम लखन सीता सहित ,
ह्रदय बसहु सुर भूप ||

Thursday, September 4, 2014

गणेशजी की आरती


जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा |
माता जाकी पार्वती, पिता महादेव ||
जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा |
एक दंत दयावन्त , चार भुजाधारी |
माथे पे सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी ||
जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा |
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया |
बाँझन को पुत्र देत , निर्धन को माया ||
जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा |
हार चढ़ै. फूल चढ़ै और चढ़ै मेवा |
लड्डुअन का भोग ,लागे संत करे सेवा ||
जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा |
दीनन की लाज रखो शम्भु सुतवारी |
कामना को पूरा करो जग बलिहारी ||
जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा |
कारज को सिद्ध करो , कष्टो को दूर करो |
जय गणेश श्री गणेश ,जय गणेश देवा |
माता जाकी पार्वती, पिता महादेव ||

Sunday, April 20, 2014

विनायकजी की कहानी

एक राक्षस था वह सभी मनुष्य को बहुत दुख देता था कही भी यज्ञ , दान , धर्म नही करने देता था सब लोग बड़ी तकलीफ में था सबने मिलकर गणेशजी की आराधना करी , तब गणेशजी बोले क्या बात है ? सब लोग इतना दुखी क्यों है ? तब सब बोले की राक्षस बहुत  दुख देवे है , इसको पाप भी कटनो है  राक्षस  ने मारने के लिए गणेशजी ने लड़ाई करी है | लड़ता लड़ता  राक्षस   मर गयो और गणेशजी लड़ता -लड़ता खूब गर्म हो गए तो सब घबराने लगे तो गणेशजी ने सबको समझाया और अपना असली रूप दिखाया तो सबने गणेशजी के हाथ जोड़े और गणेशजी की पूजा करी | गणेशजी बहुत प्रसन्न हो गए | सबने सुख - शान्ति हुई है |

गणेशजी महाराज कहता सुनता हुंकार भरता अधूरी होय तो पूरी करजो पूरी होय तो मान करजो |

Wednesday, March 26, 2014

गणगोर की कहानी









एक बार पार्वतीजी  शंकर  भगवान   के साथ  पीयर जाने  को निकली । तो शिवजी बोल्या कि मे भी आपके साथ  चलू ,तब पार्वती जी बोली मैं आपके साथ नही चलू  मेरे को शर्म आएगी तो शिवजी बोल्या  घूघंट निकाल लेना पार्वतीजी बोली मेरे को तो गर्मी लगे इतनो कहकर पतला कपड़ा ओढ़कर दोनों पियर जाने लगे रास्ते में एक गाय उठक -बैठक कर रही थी ,जब पार्वती जी बोली कि ये गाय क्यों कष्टी शिवजी ने कहा इस गाय के बच्चो होने वाला है ,इसलिए या इतनी कष्टी है |पार्वती जी कहने लगी इतनो दुख होवे तो म्हारे बच्चो नही चाहिए म्हारे तो गांठ दे दो ,शिवजी बोले आगे चलो | आगे गया तो घोड़ी  उठक -बैठक कर रही थी , जब पार्वती बोली या इतनी कष्टी क्यों है शिवजी ने कहा इस घोड़ी के बच्चो होने वाला है ,इसलिए या इतनी कष्टी है |पार्वती जी कहने लगी इतनो दुख  होवे तो म्हारे बच्चो नही चाहिए म्हारे तो गांठ दे दो ,शिवजी बोले आगे चलो | आगे गया तो एक राजा कि नगरी मे वहा पर सब उदास बैठ्या था ढोल बाजा उलटा पड़े थे पार्वती ने पूछा यहा सारी नगरी उदास क्यों है शिवजी ने कहा रानी को बच्चो होने वाला है और वा कष्टी है इस कारण सब उदास है | पार्वती जी बोली बच्चो के लिए इतनो कष्ट देखनो पड़े , तो म्हारे तो बच्चो नही चाहिए ,आप तो गाठ दे दो महाराज | लेकिन शिवजी ने गाठ नही दी और आगे चलते गये तो पार्वती जी ने अगर आप गाठ नही दो तो मे आगे नही चलू  शिवजी ने गाठ दे दी | और दोनों पीयर पहूँच गये वहा सब ओरतें पूजा कर रही थी वे सब कहने लगी शिवजी और पार्वती जी आ गये चलो पूजा करे , इधर सब सालियाँ खाना खाते वक्त शिवजी से मजाक करने लगी  तो शिवजी ने पूरा ही खाना खा लिया बाकी बचा हूया नंदी के लिए ले लिया और पीपल के निचे जाकर सो गये | पार्वती माँ से बोली माँ मेरे को भूख लगी तो माँ बोली पूरा खाना तो शिवजी खा गये पार्वतीजी ने सुखा बथुआ कि रोटी खा ली और एक लोटा पानी पीकर विदा हो गई रास्ते मे शिवजी ने पूछा आप ने क्या खाया तो पार्वतीजी ने कहा जो आपने खाया वही मेने खाया और पार्वतीजी को नींद आ गई तो शिवजी ने उनके पेट कि ढकनी खोल कर देखा उसमे सूखी बथुआ कि रोटी और एक  लोटा पानी था पार्वती कि नींद खुली तब शिवजी बोले रानी क्या खाया फिर बोली जो आप ने खाया वही  मेने खाया शिवजी बोले पार्वतीजी मेने आपके पेट कि ढकनी खोलकर देखी तो उसमे सूखा बथुआ कि रोटी और एक लोटा पानी था तब पार्वतीजी बोली आज तो आपने मेरी ढकनी खोली आगे से किसी ओरत कि ढकनी नही खुलनी चाहिए |कोई को पियर गरीब होय कोई को अमीर होय | पियर कि बात ससुराल में और ससुराल कि बात पीयर में नही कहना चाहिए उस दिन से सब कि ढकनी बंद हो गई | पार्वतीजी पानी लेने गया गाँव कि सारी औरता ईश्वरजी कि पूजा करने लगी तो शिवजी ने यहा पर सुहाग कुंडा सब औरता के बाँट दियो इतना में पार्वतीजी बोली ये आपने क्या करा बान्यारी औरता तो पैर ओढ़कर अब आएगी | आप इसकी चिंता मत कीजिए। उन स्त्रियों को मैंने केवल ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया है। इसलिए उनका रस धोती से रहेगा। परंतु मैं इन उच्च कुल की स्त्रियों को अपनी उँगली चीरकर अपने रक्त का सुहाग रस दूँगी। यह सुहाग रस जिसके भाग्य में पड़ेगा, वह तन-मन से सौभाग्यवती हो जाएगी। जब स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर दिया, तब पार्वतीजी ने अपनी उँगली चीरकर उन पर छिड़क दी। जिस पर जैसा छींटा पड़ा, उसने वैसा ही सुहाग पा लिया अब राजा कि नगरी में पहूँचे तो वहा सब दूर उत्सव हो रहा था पार्वतीजी ने पूछा यहा कैसा उत्सव शिवजी बोले रानी के लड़का हुआ इसलिए यहा ख़ुशी मनाई जा रही है  तो पार्वतीजी बोली महाराज मेरी तो गाठ खोल दो मेरे को भी बच्चा चाहिए शिवजी बोले आगे चलो तो गाय खड़ी हुई बछड़ा को चाट रही थी पार्वतीजी बोली मेरी तो गाठ खोल दो शिवजी बोले आगे चलो ऐसा करते करते घर आ गया गाठ नही खुली शिवजी बारह बरस के लिए वन में चले गये एक दिन पार्वती जी बहुत उदास बैठे थे ,बैठे बैठे अपना शरीर का मैल निकालने लगे तो बहुत सा मैल इकट्ठा हो गया तब पार्वतीजी ने मैल का पुतला बनाया  और अमृत को छीटा दिया  छीटा डालते ही लड़का ज़िंदा हो गया | एक दिन पार्वती नहाने बैठा और लड़का को दरवाजा के पास बैठा दिया बोला कि अंदर किसी को मत आने देना यह कह कर पार्वतीजी नहाने चली गई | इधर शिवजी कि तपस्या पूरी हुई और घर आ गये तो लड़का बोला  मेरी माँ नहाने गई है अंदर मत जाओ ,शिवजी बोले थारी माँ कोन है ? लड़का बोला मेरी माँ पार्वतीजी है  शिवजी को बहुत क्रोध आयो और मन में सोचा कि मैं तो बारह बरस से तपस्या करने वन मे  गयो, तो यह कैसे हुयो ? ऐसा कहकर लड़का कि गरदन काट दी और अंदर चले गये | शिवजी को देख पार्वती जी बोली कि मैने तो बाहर कुंवर को बैठाया था , आप  अंदर कैसे आये शिवजी बोले आपके लड़को कब हुओ ? मे तो उसकी गरदन काट कर अंदर आयो | ये सुनकर पार्वतीजी विलाप करने लगी तो शिवजी ने दूत भेजा कि कोई माँ अपना बच्चा के पीठ देकर सोई हो उसकी गरदन काटकर ले आना दूत सब और घूमा परन्तु उसको कोई नही दिखा ,बस हथनी अपना बच्चा के पीठ देकर सोई थी | वह उसकी गरदन काट कर ले आयो और कुंवर के लगा दी ,अमृत के छीटा से कुंवर ज़िंदा हो गया | पार्वती जी बोली कि मेरा लड़का के तो सब चिढ़ाएगा ,तब शिवजी ने लड़का के वरदान दियो की सब लोग पहले आपके लड़का कि पूजा करेगा | इतनो सुनकर पार्वतीजी बहुत खुश हुई तभी से किसी भी काम कि शुरूआत में गणेश जी कि पूजा होती है |

Sunday, March 16, 2014

गणेशजी की कहानी




एक मेंढ़क - मेंढ़की सरवर कि पाल पर रहते थे मेंढ़क दिनभर टर्र टर्र करता था तो मेंढ़की बोली कि मरया टर्र टर्र क्यों करे जय विनायक , जय विनायक कर |  अब राजा के बेल का पाँव टुट्यो तो सरवर कि पाल को गारा लाकर बरतन में भरकर चढ़ा दियो | उस गारा में मेंढ़क - मेंढ़की दोनों ही आ गया और उबलने लगे मेंढ़क बोला में तो मरने लगा , मेंढ़की बोली मेने तो पहले ही कहा था टर्र टर्र छोड़ जय विनायक बोल तो मेंढ़क जय विनायकजी , जय विनायकजी बोलने लगा तो वह  बरतन  टूट गया और दोनों पाल पर जाकर बैठ गये | है विनायक जी उसको टूटे ऐसे सबको टूटना |

कहानी के बाद बोलना

आड़ी-बाड़ी सोना कि बाड़ी , जीमे बैठी कान कुमाड़ी,
कान कुमाड़ी काई मांगे ,छतीस ही करोड़ देवता की |
बाडीजी सिया काई  होवे अन्न  होय ,धन होय, लाज होय ,
लक्ष्मी होवे , बिछड्या न मेलो होय , निपुत्र ने पुत्र होय
सासू को पुरसन , बहू को जीमन , उठ भाई तपसी जीम भाई लपसी
 भाई  को थान,भाभी को  मान थारे थारी बार्ता को फल
और मारे बरत को फल |

Saturday, March 15, 2014

(बैशाख माह) चतुर्थी की कहानी

एक साहूकार थो , उसका एक बेटा और एक बहु थी तो वा रोज रोटी बनाकर जीम कर बाहर आती तो पड़ोसन पूछती बहु कई  जिम्या तो वो बोली ठंडो-- बासो | ऐसा करते करते बहुत दिन हो गया | एक दिन उस साहूकार का बेटा ने सुन्यो तो वो बोल्यो कि माँ आज तो मेहमान आवेगा,सो अच्छा--अच्छा भोजन बनाओ तो माँ ने अच्छा अच्छा पकवान बनाया और बेटा से बोली कि बुला थारा मेहमान के | जब वो बोल्यो माँ चार थाली लगाओ अपन ही मेहमान है चारो जना साथ जीमने बैठ्या | जीमकर बाहर निकली कि बहु जिमी हां पड़ोसन जिमी , कई जिमी तो बहु बोली ठण्डी बासी | तब वो लड़को बोल्यो आज तो म्हारा साथ मे जीमने बेठी काई बात है ? जब वो अपनी औरत से बोल्यो कि तू रोज या काई बात बोले है कि ठंडो --बासी जब वा बोली कि आपकी कमाई नही , आपका बाप कि कमाई नही या तो बड़ा बूढ़ा कि कमाई है ,जिस दिन आप कमाओगा उस दिन ताजा भोजन होवेगा |
 एक दिन वो लड़को बोल्यो कि माँ में तो विदेश कमाने जाऊगा | माँ ने मना कियो कि बेटा अपना घर में ही खूब धन है तू बाहर मत जा |तो भी वो लड़का माना नहीं और विदेश चला गया और अपनी औरत के बोल के गया कि मे जब तक नही आउ तब तक दिया कि और चूल्हा दोनों की आग नही बुझनी चाहिए | अब एक दिन दोनों कि आग बुझ गई तो वा दौड़ी--दौड़ी  पड़ोसन के यहा आग लेने गई तो पड़ोसन चौथ कि पूजा कर रही थी , तो  बहु बोली कि म्हारे जल्दी से आग दे दो म्हारी सासू आवेगी तो लड़ेगी और म्हारा घर वाला कमाने बहार गया है वा बहु बोली कि चौथ कि पूजा से कई होवे ? वा बोली पूजा से अन्न होय,धन्न होय ,लक्ष्मी होय ,बर्कत होय, निपुत्र के पुत्र होय ,बिछड़ा ने मेल होय |तब बहु बोली कि म्हारे कैसे मालूम पड़ेगी कि आज चौथ है | म्हारी सासु तो कही भी बाहर नही जाने देवे और म्हारे आदमी भी बाहर गया है अभी तक कोई खबर नही है पड़ोसन बोली कि तू तो चौथमाता को बरत कर और उसी दिन से रोज एक टिपकी दीवाल पर लगा दे | ऐसी तीस टिपकी पूरी हो जाय तो  उस दिन चौथ को बरत कर लीजे जब से वा हमेशा चौथ करती | चौथ का दिन दमड़ी को घी और गुड लाकर अपना घर पर चौथ मांडकर पूजा करती और रात को चंद्रमा को अरग देकर जीमती उसकी सासु  चार टाइम खाना देती थी चौथ का दिन एक टाइम पनिहारी के देती ,एक टाइम पाड़ा के देती , एक टाइम कि बाड़ा में गढ़ा खोद  गाड़ देती और चौथी टाइम कि जीम लेती थी |

अब उसको चौथ करते करते बहुत दिन हो गया एक दिन उसका आदमी के चौथ माता ने सपनो दियो कि मानवी सूतो कि जागे मे तो सूतो भी नी और जागू भी नी चिंता में  मे पड़ा हूँ थारी चिंता मिटा और घर जा वहा पर सब तेरा इन्तजार कर रहे है वो आदमी बोल्यो माता में घर कैसे जाऊ मेरा लेना देना बहुत बाकी है  चौथमाता बोली सुबह उठकर कंकु , केशर का पग लिया ,मांडकर बैठ जाजे तो लेने वाला ले जायेगा  और देने वाला दे जाएगा सुबह उठ कर बैठ गयो लेने वाला ले गया और देनेवाला दे गया |

अब वह अपने घर के लिए निकला रास्ते में एक साँप जलने के लिए जा रहा था उस साहूकार ने उसको हटा दिया सर्प ने कहा मेरी तो उम्र पूरी हो गई थी और मे जलने जा रहा था तब वो बोल्यो कि अभी मत डस म्हारे घर जाने दे सर्प ने कहा वचन दे उसने वचन दिया अब वह घर आयो और आकर उदास बैठ गयो और चुपचाप सो गयो तब वा ओरत बोली कि आप इतना दिन के बाद आये हो तो भी चुपचाप हो क्या बात है  क्या बात है | तब वो आदमी बोलो कि मैं कुछ देर का मेहमान हूँ म्हारा बेरी दुश्मन को सही देकर आयो हूँ वो म्हारे डसेगा  उसकी औरत बहुत तेज थी उसके आदमी के तो नींद आ गई ,वह उठी और अपना बरामदा कि सात सीडी धोई और सजादी पहली पे रेत बिछाई दूसरी पर अबीर ,तीसरी पर फूल  चौथी पर केशर ,पाँचवी पर लड्डू , छठवीं पर गादी , सातवी पर दूध | इस प्रकार सात ही सीडी सजादी आधी रात को फूकरता हुआ आया पहले तो खूब  रेत में लोट लगाई और बोला कि है साहूकार के बेटा कि बहु सुख तो खूब दिया पर वचन को बाँधो हूँ डसो गो तो सही ऐसा उसने सातो ही सीडी चढतो ही गयो और बोलता गया  आगे गयो तो चौथमाता , विनायक ,और चंद्रमा तीनो मिलकर उसकी रक्षा करने लगे चौथ माता ढाल बनी , विनायकजी तलवार ,और चंद्रमाजी ने उजाला करा अब वह सर्प साहूकार के बेटा के पास जाने लगा तो विनायक जी तलवार से उसकी गरदन काट दी और ढाल से ढक दी | तब वा औरत अपना आदमी से बोली चलो अपन चौपड़ पासा खेला , अपना बेरी दुश्मन मर गया है , दोनों जना  चौपड़ पासा खेलने लगे , खेलते  खेलते बहुत देर हो गई | गाँव में बहन रहती थी वा भाई से मिलने आई तो भाई और भाभी दोनों नही उठे तब बहन बोली माँ भाई तो थका हुआ है पर भाभी को क्या हो गया वा भाई के महल में जाने लगी तो खून की नदी बह गई वा चिल्लाई कि माँ भाई को किसी ने मार डाला | बहन कि आवाज सुनकर भाभी बोली कि बाईजी हम तो ज़िंदा है हमारा बेरी दुश्मन मरा है माँ ने वहा सफाई कराकर बेटा बहु को गाजा बाजा के साथ अपने सामने बुलाया , अब सब जना एक जगह बैठ गया भाई बोल्यो माँ मेरे जाने के बाद किसी ने धर्म पुण्य करा था  तब माँ बाप बोले कि हमने कुछ नही  करा जब वा औरत  बोली कि मेने करा था सासु बोली कि मे तो  चार टाइम खाने  टाईमरोटी देती थी तब वा बोली कि आप नही मानो गा तो सबसे पूछ लो सबसे पहले पनिहारी के पास ले गई तो उसने खा हां महीने में एक बार रोटी देती थी फिर पाड़ा के पास ले गई तो  पेप का फूल निकला तीसरी बार बाड़ा में गड़ा खोदकर देखा तो सोना रूपा कि रोटी हो गई अब वा बोली कि चलो साहूकार कि दूकान पर सामान को पूछलो सासु साहूकार के पास गई हां महीने में एक बार दमड़ीका घी और गुड ले जाती थी जब वासासु बहु का पाँव पड़ने लगी |

चेल्यो को पानी मंगरे मत चढ़ाओ, 
मंगरे का पानी चेल्या में आवे है |

सासुजी में आपका पाँव लगूँ आप चौथ माता का पाँव पड़ो | हे चौथ माता बहु के टूट्या जैसे सबके टूटजो कहता,सुनता हूकारा भरता |           
  

Friday, January 31, 2014

हरतालिका का तीज

य़ह व्रत भाद्रपक्ष कि शुक्ला तृतीया को मनाया जाता है | पहले घर को साफ कर सजाये फिर पूजा के स्थान में शिव पार्वती की मूर्ति   स्थापित कर उनका मंत्र से आवाहन करे फिर आचमन करे स्नान करावे और पूजन सामग्री तथा विधि अर्पण कर इसके बाद कथा सुने |अंत में बॉस के बड़े पात्र  में पकवान ,वस्त्र -दक्षिणा आदि रखकर पण्डित को दे | इस प्रकार पूजन कर दूसरे दिन मूर्ति  को किसी जलाशय में विसजर्न कर  दे |
सूत जी बोले -----जिसके घुंघराले अलके कल्प वृक्ष के फलो से ढकी हुई है और सुंदर एवं नूतन वस्त्रो को धारण करने वाला श्री पार्वती जी कि कथा माला से जिसका मस्तक शोभायमान है , ऐसे दिगंबर रूपधारी शंकर भगवान को नमस्कार है | कैलाश पर्वत कि सुंदर चोटी पर विराजमान भगवान  शंकर से गौरा ने पूछा कि हे प्रभो !आप मुझे गुप्त किसी व्रत कि कथा सुनाइये | हे स्वामिन !यदि आप मुझ पर प्रसन्न हे तो ऐसा व्रत बताने कि करपा करे जो सभी कर्मो का सार और जिनके करने में बहुत परिश्रम न करना फल भी विशेष प्राप्त हो जाये यह व्रत करने कि कृपा करे कि मे आपकी पत्नी किस व्रत के प्रभाव से हुए है | जगत स्वामी !यदि आप मध्य अवसान से रहित है आप मेरे पति किस दान पुण्य के प्रभाव से  हुए है ? शंकरजी बोले --हे देवी ! सुनो मैं तुम्हे वह  उत्तम व्रत  कहता हूँ जो परम गोप्य एवं सर्वस्य है | यह व्रत जैसे कि तारो में चंद्रमा , ग्रहो में सूरज वर्णो में ब्राहाण , सभी देवताओ में विष्णु ,नदियो में जैसे गंगा ,पुराणो में महाभारत ,वेदो में सामवेद , इन्द्रियो में मन श्रेष्ठ समझे जाते है वैसे ही पुराणो तथा वेदो का सर्वस्व हो इस व्रत को शास्त्रो ने कहा है उसे एकाग्र मन से श्रवण  करो |इसी व्रत के प्रभाव से ही तुमने मेरा आधा आसन प्राप्त किया है | तुम मेरी परम प्रिय हो इसी कारण यह सारा व्रत मैं तुम्हे सुनाता  हूँ| भादो का महीना हो शुक्लपक्ष कि तृतीया तिथि हो और हस्त नक्षत्र हो उस दिन व्रत के अनुष्ठान से स्त्री और कन्याओ के सभी पाप भस्म हो जाते है |
 गौरी! पर्वतराज हिमालय पर गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया था. इस अवधि में तुमने अन्न ना खाकर केवल हवा का ही सेवन के साथ तुमने सूखे पत्ते चबाकर काटी थी. माघ की शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश कर तप किया था. वैशाख की जला देने वाली गर्मी में पंचाग्नी से शरीर को तपाया. श्रावण की मुसलाधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न जल ग्रहन किये व्यतीत किया. तुम्हारी इस कष्टदायक तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता बहुत दुःखी और नाराज़ होते थे. तब एक दिन तुम्हारी तपस्या और पिता की नाराज़गी को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे.
तुम्हारे पिता द्वारा आने का कारण पूछने पर नारदजी बोले – ‘हे गिरिराज! मैं भगवान् विष्णु के भेजने पर यहाँ आया हूँ. आपकी कन्या की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर वह उससे विवाह करना चाहते हैं. इस बारे में मैं आपकी राय जानना चाहता हूँ.’ नारदजी की बात सुनकर पर्वतराज अति प्रसन्नता के साथ बोले- ‘श्रीमान! यदि स्वंय विष्णुजी मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है. वे तो साक्षात ब्रह्म हैं. यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर कि लक्ष्मी बने.’
नारदजी तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर विष्णुजी के पास गए और उन्हें विवाह तय होने का समाचार सुनाया. परंतु जब तुम्हे इस विवाह के बारे में पता चला तो तुम्हारे दुःख का ठिकाना ना रहा. तुम्हे इस प्रकार से दुःखी देखकर, तुम्हारी एक सहेली ने तुम्हारे दुःख का कारण पूछने पर तुमने बताया कि – ‘मैंने सच्चे मन से भगवान् शिव का वरण किया है, किन्तु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी के साथ तय कर दिया है. मैं विचित्र धर्मसंकट में हूँ. अब मेरे पास प्राण त्याग देने के अलावा कोई और उपाय नहीं बचा.’ तुम्हारी सखी बहुत ही समझदार थी. उसने कहा – ‘प्राण छोड़ने का यहाँ कारण ही क्या है? संकट के समय धैर्य से काम लेना चाहिये. भारतीय नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि जिसे मन से पति रूप में एक बार वरण कर लिया, जीवनपर्यन्त उसी से निर्वाह करे. सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो भगवान् भी असहाय हैं. मैं तुम्हे घनघोर वन में ले चलती हूँ जो साधना थल भी है और जहाँ तुम्हारे पिता तुम्हे खोज भी नहीं पायेंगे. मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे.’
तुमने ऐसा ही किया. तुम्हारे पिता तुम्हे घर में न पाकर बड़े चिंतित और दुःखी हुए. वह सोचने लगे कि मैंने तो विष्णुजी से अपनी पुत्री का विवाह तय कर दिया है. यदि भगवान् विष्णु बारात लेकर आ गये और कन्या घर पर नहीं मिली तो बहुत अपमान होगा, ऐसा विचार कर पर्वतराज ने चारों ओर तुम्हारी खोज शुरू करवा दी. इधर तुम्हारी खोज होती रही उधर तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन रहने लगीं. भाद्रपद तृतीय शुक्ल को हस्त नक्षत्र था. उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण किया. रात भर मेरी स्तुति में गीत गाकर जागरण किया. तुम्हारी इस कठोर तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन हिल उठा और मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुँचा और तुमसे वर मांगने को कहा तब अपनी तपस्या के फलीभूत मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा – ‘मैं आपको सच्चे मन से पति के रूप में वरण कर चुकी हूँ. यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर यहाँ पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिये. ‘तब ‘तथास्तु’ कहकर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया.
प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री नदी में प्रवाहित करके अपनी सखी सहित व्रत का वरण किया. उसी समय गिरिराज अपने बंधु – बांधवों के साथ तुम्हे खोजते हुए वहाँ पहुंचे. तुम्हारी दशा देखकर अत्यंत दुःखी हुए और तुम्हारी इस कठोर तपस्या का कारण पुछा. तब तुमने कहा – ‘पिताजी, मैंने अपने जीवन का अधिकांश वक़्त कठोर तपस्या में बिताया है. मेरी इस तपस्या के केवल उद्देश्य महादेवजी को पति के रूप में प्राप्त करना था. आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूँ. चुंकि आप मेरा विवाह विष्णुजी से करने का निश्चय कर चुके थे, इसलिये मैं अपने आराध्य की तलाश में घर से चली गयी. अब मैं आपके साथ घर इसी शर्त पर चलूंगी कि आप मेरा विवाह महादेवजी के साथ ही करेंगे. पर्वतराज ने तुम्हारी इच्छा स्वीकार करली और तुम्हे घर वापस ले गये. कुछ समय बाद उन्होने पूरे विधि – विधान के साथ हमारा विवाह किया.”
भगवान् शिव ने आगे कहा – “हे पार्वती! भाद्र पद कि शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के परिणाम स्वरूप हम दोनों का विवाह संभव हो सका. इस व्रत का महत्त्व यह है कि मैं इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने वाली प्रत्येक स्त्री को मन वांछित फल देता हूँ.” भगवान् शिव ने पार्वतीजी से कहा कि इस व्रत को जो भी स्त्री पूर्ण श्रद्धा से करेगी उसे तुम्हारी तरह अचल सुहाग प्राप्त होगा.
और जो नारी भादो के शुक्लपक्ष कि तृतीया को यह व्रत नही करती आहार कर लेती है |वह सात जन्मो तक बंध्या रहती है एंव अगले जन्म मे विधवा हो जाती है | दरिद्रा रुपी अनेको कष्ट भोगना पड़ता है | उसे पुत्र शोक छोड़ता ही नही और जो उपवास नही करती वह  घोर नरक मे जाती है फल खाने से बंदरी होती है जल पि लेने से जोक होती है हे देवी जो स्त्री इस प्रकार से सेवा व्रत किया करती है वह तुम्हारे समान ही अपने पतिके साथ पृथ्वी पर अनेको बार विहार करती है इसकी कथा श्रवण करने से हजार अश्वमेघ एवं सो बाजपेयी का फल मिलता है |

Saturday, January 25, 2014

( भादों माह ) चतुर्थी की कहानी

एक साहूकार था | उसके चार लड़का था और चार बहु थी | सासु उपवास व्रत कुछ भी नही करने देती थी तो सबने अपने आदमी से बोला कि आपकी माँ को पियर छोड़ दो हम  उपवास , व्रत , धर्म ,पुण्य तो सुख से करांगा ,तो उसने अपनी माँ को पीयर  भेज दी अब सभी बहुओ ने चौथ माता की पूजा करी | चंद्रमा  में देर थी तो वे सब सो गई तो चंद्रमा बहुत ऊपर चढ़ आया थोड़ी देर बाद छोटी बहु कि नींद खुली,तो चंद्रमा का नाम नही आ रहा तो वह सब  जेठानी का कमरा का पास जाकर आवाज लगाई बड़ा भाभीजी  कोण्डलियो छोटा भाभीजी  कोण्डलियो
घर में चोर आया हुआ था |उस चोर का नाम भी कोण्डलियो था | वह समझा कि उसने मुझे पहचान लिया वो सीधा कचहरी गया  और बोला कि साहूकार का बेटा  कि बहु तो सब जानती है उसने तो मेरा नाम ही बता दिया तो थानेदार ने कहा जाओ उस साहूकार को बुलाकर लाओ  साहूकार आया तो उससे पुछा कि तेरी बहु जानकार  है उसने चोर का नाम तक बता  दिया अब बहु को बुलाकर लाओ बहु आई तो पूछा तू तो बहुत जान कार है चोर का नाम तक बता दिया वा बोली कि मेरे को तो मालुम भी नही की चोर का नाम कोण्डलियो  है में तो चंद्रमा का नाम भूल गई थी तो कोण्डलियो कोण्डलियो आवाज लगाई तो मालूम  हुयो कि चोर का नाम कोण्डलियो  है इस बात पर राजा  ने उसके बहुत सो धन दियो और घर में भी चौथ माता टूटी
अब वो साहूकार ने अपनी ओरत  से बोल्यो कि तुम तो बाहर बैठो बहुओ के रसोई सोपो, आया गया के मुठ्ठी दो यो सब धन बहु का  भाग से बचो है नही तो सब चोर ले जाता |है चौथ माता उसके टूटी जैसी सबको टुटजो |

Wednesday, January 22, 2014

भाई दूज विधि

दीपावली के बाद दूज का दिन भाई दूज आवे है |इस दिन भाई व् बहन को यमुनाजी में नहाने को महात्म है |फिर भाई बहन को साड़ी ओढ़ावे  है | उस दिन भाई को अपनी बहन के यहा भोजन करना चाहिए | बहन भाई को तिलक लगाकर हाथ में श्रीफल देकर आरती उतारनी चाहिए | भाई अपनी बहन को उपहार देना चाहिए |

भाई दूज की कहानी

सात बहन का बीच मे एक भाई थो अकेला होने के कारण उसके सब प्यार से रखते थे सब बहनो  कि शादी तो बहुत दूर- दूर हुई पर एक छोटी बहन  कि शादी पास में  हुई |अब उस लड़का कि सगाई हो गई और शादी को समय आयो तो माँ ने अपना बेटा से कहा कि बेटा जा सब बहनो को बुलाकर ले आ तब उसने माँ से कहा कि माँ में अकेला हूँ इतनी दूर दूर कैसे जाऊ तू तो रहने दे छोटी बहन पास मे ही है अपन उसको ही बुला लेगे | इतनो सुनते ही माँ भी राजी हो गई |
अब वह छोटी बहन को लेने गयो तो उस दिन भाई दूज थी बहन दरवाजा पर भाई कि मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करने लगी |उसने भाई को आते देख लिया पर पूजा छोड़ना उचित नही समछा | भाई चुपचाप उसकी गतिविधि  देखतो रयो अब पूजा खतम हुई तब बहन ने भाई से कहा भैया माफ करना मे आपके पहचान नही पाई दोनों भाई बहन भीतर गये और बातचीत करने लगे सबका आपस में हाल चाल पूछने लगे अब वा तो भाई को देख ख़ुशी से फूली नही समाई | नया नया  पकवान बनाकर भाई को खिलाया |
भाई ने बहन से कहा सुबह आप को चलना है मेरे साथ मेरी शादी है बहन ने कहा आज तो आप जाओ मे कल आजाऊॅगी | तुम्हारे लिए लड्डू बनाये है ये लेते जाओ | जब वो जाने लगा तो थोड़ी दूर गया कि उसके समझ मे आयो  उसने पीछे से लड्डू देखे तो आटा  का अंदर साप  का कण   पीस गयो | वह तो देखते से ही दौड़ी और भाई का प्राण बचा लिया | इसलिए बहन भाई कि और भाई बहन क रक्षा करे है | और यह  त्यौहार मनाते है |

Thursday, January 16, 2014

ऋषी पंचमी की कहानी


एक माँ  बेटा था , वे बहुत ही गरीब थे | बेटा  रोज जंगल में जाकर के लकड़ी लातो और बेचकर  घर चलातो | अब भादवा को महीनो आयो , ऋषी पंचमी को दिन आयो , तब वो बेटो माँ से बोल्यो -----माँ सब अपनी बहन से राखी बंधवावे है , में  भी बहन के घर जाऊॅ राखी बंधवाने | तब वा माँ बोली ----बेटा अपन तो बहुत गरीब है ,तू बहन के घर कोई चीज लेकर जावेगो ? माँ ये लकड़ी का पैसा है | अब वो लकड़ी  का पैसा लेकर गया तो रास्ता में चोर ने उससे पैसा छीन कर उसको मारकर रास्ता में ही पटक दिया | जब ऋषी ने मन में विचार कियो कि अपन इसके जीवित नही करुगा तो अपनी बात कोई नही मानेगा |
जब ऋषी  ने अमृत का छाटा देकर उसको जीवित कर दिया तो वह वापस अपने घर जाने लगा तब वे ऋषी बोल्या कि तू बहन के यहाँ क्यों नही जावे है , तो वो  लड़को बोल्यो कि महाराज बहन के यहाँ खाली हाथ कैसे जाऊ , म्हारा पैसा तो चोर ले गया | सूना हाथ बहन से राखी कैसे बंधाऊगा  जब ऋषी ने एक लकड़ी दी और कहा कि बहन राखी बांधे तो या लकड़ी थाली में डाल देना | अब भाई बहन के घर गयो बहन सूत कात रही थी | भाई जाकर खड़ो हो गयो और बहन सूत काटती रेवे |सूत को तार लव तक नही जोड़े बहन भाई से बोले नही | तब भाई ने बहुत ही बूरो लग्यो और भाई वापस घर जाने लगा |इतना में ही सूत का तार जोड़कर बहन ने भाई को बुलाया और बहन बोली में तो तेरा ही रस्ता देख रही थी , कई  करू मेरा सूत का तार जुड़े नही और में थारे से बोलू नही |   बाद में भाई के पाटा पर बिठाकर राखी बाँधी तो भाई ने  थाली में एक लकड़ी डाल दी | देवरानी , जेठानी हसने लगी तो वा लकड़ी एकदम सोना की सांखली देखकर चकित हुआ है | वा  अपनी जेठानी  से पूछने लगी कि काई रसोई बनाऊ जब वा जेठानी बोली कि थारे भाई बहुत दूर से और बहुत दिन में आयो है , घी में चावल बना ले | वा बहन तो भोली थी उसने घी में चावल डाल कर  चढ़ा दिया अब दो घंटा हो गया जब भी चावल सीजे नही जब वो भाई बोल्यो कि बहन घी में चावल नही बने तू तो दूध ला और खीर बनाकर सबके थाली परोस दे अब सब लोगो ने खाना खाया |
भाई सुबह जाने लग्यो , बहन अंधेरा में उठकर ही लाडू करने के लिए गेहू पीसने लगी और लड्डू बनाकर भाई के साथ रख दिए अब थोड़ी देर में बच्चा उठ गया और उजालो भी होने लग्यो तो बच्चा बोल्या माँ मामा को जो लड्डू दिए वो मेरे को भी दो jb वा लड्डू देखे तो उस में साँप का छोटा छोटा टुकड़ा था वैसे ही भाई के पीछे दोड़ी तो उसने भाई को दूर से ही आवाज लगाई भाई रूक जा , भाई रूक गया जब भाई बोल्यो कि म्हारे पीछे क्यों आई मे तो घर से खली हाथ आयो हूँ नही मे तो तेरी जान बचने आई हूँ मेने जो लड्डू दिए थे उसमे साप पिसा गया था उसने उसके हाथ से वह लड्डू लेकर फेक दिए और भाई को साथ लेकर घर आ गई और दो तिन दिन बाद  उसको जाने दिया |
हे ऋषी देवता उसके भाई को टूट्या ऐसा सबके टुटजो कहता सुनता, हुंकारा भरता |            

Friday, January 10, 2014

सत्तू तीज की कहानी








एक साहूकार थो | उसका सात लड़का था | भादो को महीनो आयो | अधियारो पखवाड़ों आयो सातुड़ी तीज को दिन आयो | उस दिन बहु ने खड़ा नीम की पूजा करी तो उसको आदमी मर गयो | दुसरा  |बेटा   की शादी करी और बहु ने खड़ा नीम पूज्यो उसको भी आदमी मर गयो |इस प्रकार छ: बेटा तो मर गया सासु बोली कि अब तो बेटा को ब्याह नही करा म्हारे तो सब |बेटा मर गया एक को तो रहने दो तो साहूकार बोल्यो कि अब अच्छी पढ़ी लिखी बहु लायगा उसकी भी शादी करी तीज को दिन आयो सासु बोली कि हम तो सब खड़ा नीम की पूजा करा तो बहु बोली कि मै तो कोई  खड़ा नीम नही पूजू म्हारे पीयर में तो भीत पर नीम कि डाल गाढ़ देवे और उसकी पूजा करे बहु ने दीवार पर नीम मांडकर पूजा करी तो उसका छ:जेठ जिन्दा हो गया |उसी दिन वा सब जिठानी को बुलाकर लाई और बोली की चलो पिंडा पासो तो वे बोली की कायका पिंडा पासा पासने वाला तो मर गया तो बहु बोली सब जिन्दा हो गया सब जनीआई और सबने पूजा करी पिंडा पास्या और अरग दियो |गाँव में ढिढोरो पिटवा दियो कि अब सब जनी दीवाल पर नीम की डाली गाड़ कर पूजा करे |                       

पथवारी की कहानी


एक डोकरी थी | वा पथवारी माता पथ  की  दाता डोकरी को रूप धरकर आई और रास्ता में बैठी थी उधर से दो बंजारा की  बालद आई  तो एक कि  बालद में खांड  खोपरो और दुसरा  की बालद में लुनतेल | तो पथवारी माता ने पूछ्यो कि थारी  में  कई है खांड  खोपरो  वाली ने लुनतेल बतायो और  लुनतेल वाली ने  खांड  खोपरो बतायो   अब दोनों की आपस में बालद  बदल गई अब वे लड़ते लड़ते राज में पहुची कि राजाजी हमारी दोनों की बालद  बदल गई अब कई होवेगा |
     तब राजा ने कीयो कि तुम्हारे कोई रास्ता में मिल्यो थो कई तो बोले  हा राजासाहेब एक डोकरी मिली थी तो वे बोले कि अब तुम उसी का  पास जाओ वाही तुम्हारी निकाल करेगी वे दोनों उस डोकरी का पास गई तो डोकरी बोली की तू झूठ बोली थी इसलिए जिसके जैसी इच्छा थी वैसो काम हो गयो अब इसमे म्हारो कई दोष है |तो अब माता कैसे कई हो वेगो तब पथवारी माता ने अपनी अपनी बालद जैसी थी वैसी करदी | अधूरी होय तो पूरी |करजे पूरी होय तो मान करजो |  

Thursday, January 9, 2014

शरद पूर्णिमा की कहानी


एक साहूकार के दो बेटी थी दोनों बहन पूर्णिमा को व्रत करती थी | बड़ी बहन तो पूरा व्रत करती और छोटी बहन अधूरो व्रत करती |छोटी बहन का बच्चा होते ही मर जाता और बड़ी बहन का बच्चा जीवित रहता | ऐसा करते- करते बहुत दिन हो गया | एक दिन छोटी बहन बड़ा पंडित ने पूछयो कि मेरा बच्चा होते ही क्यों मर जावे सो म्हारे बताओ | पंडितजी बोल्या कि तू  पूर्णिमा को अधुरो व्रत करती थी उसको दोष से थारा बच्चा होते ही मर जाते है | अब तू  पूर्णिमा को पूरा  व्रत कर तो थारा बच्चा जीवित  रहेगा |उस छोटी बहन ने पूरो पूनम को व्रत कर्यो फिर भी उसके लड़को हुयो वो भी मर गया तो वा छोटी बहन उस लड़को के पटिया पर सुलाकर ऊपर से कपड़ो ढक दियो और बड़ी बहन के बुलाकर उसके उस पटिया पर बैठने को बोल्यो तो वा पटिया पर बैठते ही उसको लडको जीवित हो गयो और रोने लग्यो तब बड़ी बहन बोली कि तुम्हारे यह कलंक कैसे लग्यो अगर मै इसका ऊपर बैठ जाती तो यो लड़को मर जातो तब छोटी बहन बोली कि तेरा ही भाग से म्हारे यो लड़को जीवित रह गयो है |तो छोटी बहन बोली कि मै अधुरो  व्रत रखती तो थारो बच्चा जीवता और म्हारा मर जाता तो थारे  बुलाई थारो हाथ लगते ही म्हारे बच्चो जी गयो या सब थारी ही मेहरबानी है तो सारा गाँव में ढिढोरा पिटवा दियो कि सब कोई पूनम को बरत पूरो करे | कहता सुनता हुंकारा भरता |  

Saturday, January 4, 2014

मई चौथ व्रत कि कहानी ( तिल चतुर्थी )

                                                         
 एक साहूकार थो उसके कोई बच्चा नही था | एक दिन साहूकार कि ओरत पड़ोसन के पास गई और बोली कि आज म्हारे अग्नि दे दो तब वा पड़ोसन चौथ माता कि पूजा करती रेवे |तो उसके वा साहूकार कि बहु  बोली या पूजा  किस देवता कि है | तब वा पड़ोसन बोली कि चौथ माता कि |
साहूकार कि बहु बोली कि इसकी पूजा करने से कई होवे है | तब वा पड़ोसन बोली कि या चौथ माता कि पूजा है| और इसको करने से अन्न होय , धनं होय , बिछड़ाया ने मेला होय , निपुत्र से पुत्र होय |तब वह बोली कि म्हे भी चौथ माता से मान करु कि म्हारे भी बेटो होवे |तो में भी सवा मन को तिलकुटो बनाकर के चढ़ाऊगा |
अब नो महीना बाद उसके लड़को हुयो , पर वा  मई चौथ माता का दिन तिलकुटो चढ़ानो भूल गइ | अब इस प्रकार उसके सात  लड़का हुआ  सातो लड़का का ब्याह  कर दिया | वा मंदिर में उतारे और बेटो मर जावे , बहु रह जावे , सातवा लड़का कि बहु केवे ससुरजी अपना पास तो धन खूब है म्हे तो  एक टको सोना देकर रोज  नई जुनी बात सुनुगा तब वा हनुमानजी का मंदिर में गई और एक टको सोना को दियो और नई  जुनी बात सुनी |
रात के बारह बजे एक साधु हनुमानजी का मंदिर आयो और  उनका मोड़ , चुनरी सब लाकर धर दियो और गंगाजल छाट  दियो और सबके जीवित कर दिया ये वे ही हनुमान था |तब सब लड़का बोल्या कि माँ ने मई चौथ का दिन सवा मन तिलकुटा बोल्यो थो पर भूल गई | तब चौथ माता ने क्रोध कियो और सात ही के ले लियो | सात बहु विधवा हो गई उस छोटी के पूछ्यो कि काई बात है तू तो रोज सवा टको सोना को देकर नई जुनी बात पूछती थी | तब वा बोली कि मई चौथ का दिन सवा मन तिलकुटो  बनाकर चौथ माता के भोग लगानो    है
 हे चौथमाता उनके सुहाग दियो जैसे सबके दीजे कहते कहते  हुंकार भरता |अधूरी होय तो पूरी कर जो , पूरी होय तो मान कर जो |          

 

Wednesday, December 11, 2013

गणगोर पूजते समय का गीत (Gangor worshipping time's song)


गोर गोर गोमती |
ईश्वर पूजे पार्वती |
पार्वती का आला लीला |
गोर को सोना का टीला |
टीला दे टपका दे रानी
बरत करे गोरा दे रानी
करते करते आस आयो मास आयो |
खेड़े खांडे लाडू आये |
लाडू ले बीरा ने दियो बीरो लेमन साडी ,
साडी में सिगोड़ा बाड़ी में बिजोडा,
राण्या पूजे राज में माका सवाग में |
स्वाग भाग कीड़ी ये कीड़ी थारी जात हे
जात पड़े गुजरत हे |
गुजरात्यारो पाणी आयो |
दे दे खुट्या ताणी आयो
आखा फूल कमल कि डोरी |
एक, दो, तिन, चार, पाँच, छ, सात, आठ,
नो, दस, ग्यारह, बारह, तेरा, चौदह, पंद्रह, सोलहा |

शीतला सप्तमी कि कहानी (The story of Sheetal Saptmi)

चैत को महीनो आयो, शीतला सप्तमी को दिन आयो  सब ने माता कि पूजा करी , उमे एक साहूकार का बेटा कि बहु ने गर्म -गर्म सामान से पूजा करी और भोग लगायो तो माता के बदन में बहुत आग लगी , माता दौड़ती - दौड़ती कुम्हार का घर में पहुँची और बोली म्हारे बदन में बहुत जलन हो रही है, तो मिटटी में म्हारे लोटनो है और थारे घर में बासी रोटी होय , तो खाने को दे तो कुम्हार ने राब और रोटी माता के खाने के लिए दी तब जाके माता ठंडी हुई |सारी नगरी में हाहाकार मच गई और कुम्हार कि हवेली सोना कि होगी, तो कुम्हार को सबने मारा और बोला कि तूने कई कण कामण करियो हे , जिससे थारो मकान सोना को हो गया, तब कुम्हार बोल्यो मैने तो कई भी नि करियो मैने हो माता के ठंडी रोटी और राबको भोग लगायो थो और ठंडी ही खायो थो और आप सबने गर्म गर्म को भोग लगायो और गर्म ही खायो, जिससे ऐसो हुयो, तब सबने कियो कि माता कहा हे तो कुम्हार बोल्यो कि माता निमड़ी कि ठंडी छाया में बैठी है तब सब जना माता के पास आया और विनती करी तब माता बोली कि सबने गर्म गर्म से पूजा करी तो म्हारा शरीर में छाला पड गया और कुम्हार ने ठंडी चीज से म्हारी पूजा करी हे इससे में ठंडी हो गई तब माता बोली होली के बाद का सात दिन म्हारा दिन मानना छठ के ठंडी बना के रख देनो और दूसरे दिन म्हारी पूजा करके भोग लगनो उस दिन कोइ ने भी गर्म चीज नही खानि चाहिए |ऐसा सारी नगरी में ढिढोरा फिरवा दीजो | जब से यही प्रथा चली आ रही हे | हे माता जेसे कुम्हार के घर सुख दियो वेसे सबके दीजो और नगरी में दुख हुयो ऐसा कोई के मत दीजो अधूरी होय तो पूरी करजो पूरी होय तो मान करजो |

Saturday, December 7, 2013

अरख देते समय बोलना (When giving Aarakh, speak this.)

चांदा  हेलो उगियो, हरिया बास कटाय
साजन उबा बारने, आखा पाती लाय,
काये केरो दिवलो, काये केरी वात
सोना केरो दिवलो रूपा केरी बात
कोन सजायो दिवलो कोन सजाई बात
में पनोती संजोयी, दिवलो संजोई बात,
पिलो उड्यो आपके, मी जिमयो बाद के,
मई चोथ को चाँद, देखता जिओ बीर भरतार |

करवा चौथ कि कथा (Story of Karva Chauth)



एक साहूकार था उसके सात बेटा--बहु और एक लड़की थी | उस लड़की को ब्याह कर दियो थो अब वा लड़की अपना पियर आई करवा चौथ को दिन आयो | सब भाभी ने चौथ का बरत करयो जब वा नंद बोली कि भाभी में भी चौथ को बरत करू | तब उसकी भाभी बोली बाईजी आप मत करो आपसे भूखा रहते नही बनेगा | पर नंद ने कहनो नही मान्यो और दिन भर उपवास रखो अब शाम के भूख के कारण  मुँह उदास हो गयो |

अब उसको सब भाई आया और बहन से बोल्या चल बहन अपन जीमा | तब बहन बोली कि म्हारे तो चंद्रमा देखकर ही भोजन करनो है | तब भाई बोल्या बहन चंद्रमाजी उग आया है | चल थारे बतावा अब एक भाई तो चलनी लेने गयो, दुसरो भाई डूगंर पर चढ़ गयो |तीसरा भाई झाड़ का ऊपर चढ़ गयो | बोल्यो बहन देख चंद्रमा, चंद्रमा देखकर भाभी बोली बाईजी ये तो आपको चंद्रमा उग्यो हमारो नही उग्यो है |

जब वा नंद ने चंद्रमा देख्यो अरख दियो, करवा पियो और जीमने बेठ गई | अब पहले कवो लियो तो सिर को बाल आयो, दुसरो कवो लियो और एक दम खड़ी हो गई तीसरो कवो लियो तो उसका आदमी कि मरने कि खबर आई | अब उसकी माँ ने कियो कि जो पेटी में कपड़ा हाथ में आवे वही पहन जा | अब उसने पेटी में हाथ डाल्यों तो सफेद घाघरो ओढ़नी हाथ में आयो वो पहनकर चली गई और रस्ता में जो भी मिले उसका  पाँव लगती जाय |

वा  पाँव लगती लगती ससुराल पहुची तो घर में सबका  पाँव पड़ती जावे पर कोई ने आशीष नही दी अब ६ महीना कि जेठुति पालना में सोई थी उसने ही आशीष दी कि दूधो नहाओ, पूतो फलो और अखण्ड सौभाग्वती होवो |अब सब गाँव का भेला हुआ, उसको आदमी के ले जाने लग्या तब वा बोली कि मेरा आदमी के नही ले जाने दुगी सब लोग परेशान हो गया और गाँव के बाहर एक घर बनाकर उसमे मुर्दा को उसके रख दी |वह अपना आदमी कि सेवा करती रही | ऐसो करता करता करवा चौथ को दिन आयो |

उस दिन इंद्र कि अप्सरा निचे उतरी और चौथ मांडकर पूजा करने लगी तो वा बोली कि कोई पूजा मत करो क्योकि मैने चौथ को व्रत कियो तो म्हारे आदमी मर गयो | जब वे अप्सरा बोली कि तूने व्रत को भंग कियो जिससे थारो आदमी मर गयो तू आज भी चौथ कर और बारह चौथ माता आवे उस का पाँव में पड़ जाजे |

अब उसने चौथ को व्रत कर्यो और रात के बारह बजे तक चौथ माता को रास्तो देख्यो | अब चौथ माता विकराल रूप धरके आई |नक् पड़े है, लाल पड़े है ,लम्बा  बाल है बड़ा बड़ा दाँत है |अब वा चौथ माता का पाँव पकड़ लिया जब चौथ माता बोली कि है दुष्टनी पापनी म्हारा पाँव छोड़ दे जब वा बोली कि म्हेतो आज आपका पाँव नही छोड़ूगा म्हारा आदमी के जीवित करके जाओ |

जब चौथ माता बोली महतो करवा चौथ कि छोटी बहन हूँ | म्हारा से बड़ी आवे उसका पाँव पकड जे ऐसे ग्यारह महीने कि चौथ आई | और जब चौथ माता यू कह कर गई कि करवो लेओ सात भाई कि बहन करवो ले, बिलन बाई करवो ले, चालनी में चाँद देखनी करवो ले, धनी भूखाली करवो ले, डुंगर में दू लगानी करवो ले, बरत भागनी करवो ले | वा बोली कि म्हारा से बड़ी बहन आवेगी वा थारे सुहाग देवेगी |

अब ऐसो करता करता फिर से करवा चौथ आई तो उसने सिर धोयो उपवास रख्यो, पूजा करी, करवो पियो और बैठी | रातका चौथ माता आई तो उसने जमकर पाँव पकड़ लिया | और बोली कि जब तक आप म्हारे आदमी के जीवित नही करोगा, तब तक मै नही जाने दूंगी |

अब चौथ माता ने अमृत को छीटों दियो और उसके आदमी को जीवित कर दियो | वो उठ्यो दोनों जना साथ में जिमया, और नगरी में आया | सबके बड़ो अचंभो हुयो है, सबने गाजा बाजा से उनके सामा लिया जाता ही वा सबके पाँव पड़ी सबने आशीर्वाद दियो | है चौथ माता उसके सुहाग दियो वैसे सबके दीजे | कहता सुनता हुंकारा भरता | अधूरी होय तो पूरी कर जो , पूरी होय तो मान कर जो |

गणेशजी कि कहानी (Story of Shri Ganeshji)




चिमटी में चावल, चिमटी में दूध , एक ब्राहाण को लड़को नगरी में आयो और कहने लग्यो कि कोई भाई म्हारे खीर कर दो पूरी नगरी में फिरयो पर कोई ने हामी  नही भरी | एक बुढ़िया बैठी थी , वा बोली मै कर दू | वा छोटा सा बरतन में करने लगी तो वो लड़को बोल्यो कि माँ तू तो छोटा बरतन में मत कर, बड़ी कडाई चढ़ा दे, ऐसो कहके वो लड़को चल्यो गयो और खेलने लग्यो | जब खीर उफनने लगी वा तो उफनती बंद ही नि होवे तो डोकरी कि बहू ने एक कटोरा में खीर ठंडी करके और दरवाजा का पीछे से जै विनायकजी भोग लग | जो ऐसो कहकर के खीर पिली डोकरी बोली चल रे गणेशा खीर पीले झट गणेशजी आया और डोकरी से बोल्या माँ थारी बहु ने  म्हारे भोग लगाकर दरवाजा का पीछे खीर पिली अब तू सारी नगरी के जमा दे | डोकरी ने सारी नगरी  नोत दी | और जिमाने लगी सब जीम गया फिर भी किनार खाली नही हुई |
डोकरी बोली कि महाराज सब जीम गया फिर भी खीर बहुत है जै विनायकजी महाराज खीर के छेवनही आयो वेसो म्हारा घर को छेव भी मत आजो | अधूरी होय तो पूरी करजो पूरी होय तो मान करजो |