Saturday, May 16, 2015

श्री अन्नपूर्णाजी की आरती

बारम्बार प्रणाम मैया बारम्बार प्रणाम
जो नहीं ध्यावे तुम्हे अम्बिके , कहाँ उसे विश्राम
अन्नपूर्णा देवी नाम तिहारो , लेत होत सब काम
प्रलय युगान्तर और जन्मान्तर , कालान्तर तक नाम
सुर सुरो की रचना करती , कहाँ कृष्ण कहाँ राम
चुमहि चरण चतुर चतुरानन, चारू चक्रधर शयाम
चन्द्र चुड़ चन्द्रानन चाकर ,शोभा लखहि सलाम
देवी देव। दयनीय दशा में दया दया तब जाम
त्राहि त्राहि शरणागत वत्सल , शरण रूप तब धाम
श्री ही श्रध्द श्री हे एे विघा , श्री कली कमला काम
कांति भ्रांतिमय कांतिं शांति सयोवर देतू निष्काम ।


Friday, May 15, 2015

श्री गंगाजी की आरती

ओऽम जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता
जो नर तुमको ध्याता ,मनवांछित फल पाता ।ओऽम
चन्र्दसी ज्योति तुम्हारी ,जल निर्मल आता,
शरण| पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता । ओऽम
पूत्र सागर के तारे ,सब जग की ज्ञाता
तेरी कृपा दृष्टि है मैया त्रिभुवन सुखदाता । ओऽम
एक बार जो प्राणी तेरी शरण आता
यम की त्रासमिटाकर परममोक्ष पाता ।
आरती माता तुम्हारी जो नर नित्य गाता
सेवक वही सहज में मुक्ति को पाता । ओऽम

श्री गायत्री देवी की आरती

आरती श्री गायत्रीजी की ज्ञान द्वीप और श्रद्धा की बाती
सो भक्ति ही पूर्ति करै जहं घी की । आरती
मानस की शुची थाल के ऊपर ,
देवी की ज्योति जगै जह नीकी
शुध्द मनोरथ ते जहां घण्टा
बाजै करै आसुह ही की । आरती
जाके समक्ष हमें तिहुं लोक के ,
गद्दी मिले तबहुं लगे फीकी । आरती
आरती प्रेम सौ नेम सो करि
ध्यावहिं मूरति ब्रम्हा लली की । आरती
संकट आवे न पास कबौ तिन्हें
सम्पदी और सुख की बवै लीकी । आरती

Thursday, May 14, 2015

श्री जगदम्बा माता की आरती

आरती कीजे शैल सुता की
जगदम्बा की आरती कीजै
स्नेह सुधा सुख सुदंर लीजै
जिनके नाम लेत दृग मीजै
ऐसी वह माता वसुधा की । आरती
पाप विनशिनी कलि मल हारिणी
दयामयी,भवसागर तारिणी
शस्त्र धारिणी शैल विहारिणी
बुध्दिराशी गणपति माता की । आरती
सिंहवाहिनी मातु भवानी
गौरव गान करें जग प्राणी
शिव के ह्रदयासन की रानी
करें आरती मिल जुल ताकी । आरती

श्री अम्बाजी की आरती

अम्बे तू जगदम्बे काली जय दुर्गे खप्पर वाली,तेरे ही गुन गाये भारती
ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ।
तेरे भक्त जनों पर माता पीर पडी है भारी
दानव दल पर टूट पडा माँ करके सिंह सवारी
सौ सौ सिंह से बलशाली है दस भुजा वाली,
दुखियों के दुखडे निवारती । ओ मैया
माँ बेटे का है इस जग में बडा़ ही निर्मल नाता
पूत कपूत सुने है पर ना माता सुनी कुमाता
सब पे करूणा दरसाने वाली अमृत बरसाने वाली
दुखियों के दुखडे़ निवारती । ओ मैया
नही हम मांगते धन और दौलत ना चाँदी ना सोना
हम तो मांगे माँ तेरे में एक छोटा सा कोना
सबकी बिगडी़ बनाने वाली लाज बचाने वाली
सतियो के सत को संवारती । ओ मैया

Tuesday, May 12, 2015

श्री रामचन्द्रजी की स्तुति


श्रीरामचन्द्रजी कृपालु भजु मन हरण भव भय दारूणं ।
नवकंज लोचन,कंजमुख,करकजं ,पद कंजारूणं ।।
कंदर्प अगणित अमित छवि ,नव नील नीरद सुंदरं ।
पट पीत मानहु तडित रूची शुचि नौमी जनक सुतावरं ।।
भजु दीन बंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनं ।
रघुनंद आनंद कंद कोशल चदं दशरथ नंदनं ।।
सिर मुकुट कुंडल तिलक चारू उदारू अंग विभुषणं ।
आजानु भुज सर चाप धर ,संग्राम जीत -खर दूषणं ||
इति वेदति तुलसीदास शंकर -शेष -मुनि -मन रंजनं |
मम ह्रदय कुंज-निवास कुरू ,कामादि खल -दल - गजनं ||
दोहा --मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरू सहज सुंदर साँवरो |
करूणा निधान सुजान सीलु सनेहू जानत रावरो ||
एहिभाँति गौरि असिमसुनि सीयसहित हियँहरषी अली 
तुलसी भावनिहिपूजि पुनि -पुनि मुद्रित मनमन्दिर चली ||   

Monday, May 11, 2015

श्री रामचन्द्र की आरती

आरती कीजै रामचन्द्रजी की,
हरि हरि दुष्ट दलन सीता पतिजी की ।
पहली आरती पुष्पन की माला,
काली नाग नाथ लाये गोपाला ।
दुसरी आरती देवकी नन्दन ,
भक्त उबारन कंस निकन्दन ।
तीसरीं आरती त्रिभुवन मोहे ,
रत्न सिहासन सीता रामजी सोहे।
चौथी आरती चहूं युग पूजा ,
देव निरंजन स्वामी और न दूजा ।
पाँचवी आरती राम को भावे ,
रामजी का यश नामदेवजी गावे ।

श्री यमुना की आरती

ओऽम जै यमुना माता ,हरि ओऽम जै यमुना माता
जो नहावे फल पावे सुख सुख की दाता । ओऽम
पावन श्री यमुना जल शीतल अगम बहे धारा
जो जन शरण से कर दिया निस्तारा । ओऽम
जो जन प्रातःही उठ कर नित्य स्नान कर
यम के त्रास न पावे जो नित्य ध्यान करे । ओऽम
कलिकल मे महिमा तुम्हारी अटल रही
तुम्हारा बढा महातम चारो वेद कही । ओऽम
आन तुम्हारे माता प्रभु अवतार लियों
नित्य निर्मल जल पिकर कंस को मार दियो । ओऽम
नमो मात भय हरणी शुभ मंगल करणी
मन बैचेन भया है तुम बिन बैतरणी । ओऽम

 

Friday, May 8, 2015

श्री लक्ष्मी माता की आरती

जय   लक्ष्मी  माता जय लक्ष्मी माता
तुमको निशदिन सेवत हर विष्णु विधाता ।
ब्रमाणी कमला तू ही है जगमाता
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत नारद ऋषि गाता । जय ...
दुर्गा रूप निरन्जन सुख सम्पति दाता
जो कोई तुझको ध्यावत ऋृध्दि सिध्दि धन पाता । जय ...
तू ही है पाताल बसन्ती तू ही शुभ दाता
कर्म प्रभाव प्रकाशिनी नवनिधी की त्राता । जय ...
जिस घर थारो बासो तेही मे गुण गाता
सब संभव हो जाता मन नही घबराता । जय ...
तुम बिन यज्ञ न होवे वस्त्र न कोई पाता
खान पान वैभव सब तुमसे ही आता । जय ...
शुभ गुण सुन्दर मुक्ति क्षीर निधी जाता
रत्न चतुर्दश ताको कोई नही पाता । जय ...
आरती लक्ष्मीजी की जो कोई नर गाता
उर आन्नद अति उमंगे पाप उतर जाता । जय ...
स्थिर चर जगत बचाये कर्म प्रख्यात
राम प्रताप मैया की शुभ दृष्टि चाहता । जय ...

 

Saturday, April 18, 2015

श्री दुर्गाजी की आरती

जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
तुमको निश-दिन ध्यावत हरि-- ब्रम्हा -शिवजी || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
मांग सिन्दूर विराजत टीको मृगमदको |
उज्जवल से दोऊ नैना चन्द्रबदन निको || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै |
रक्त पुष्प गलेमाला कण्ठन पर साजै ||  जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
केहरि -वाहन राजत खड़ग्-खप्पर धारी |
सुर- नर -मुनि -जन सेवत, तिनके दुःख हारी || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
कानन कुण्डल शोभित  नासाग्रे मोती |
कोटिक चन्द्र दिवाकर सम राजत ज्योति || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
शुंभ -निशुंभ विडारे महिषासुर -धाती |
धूम्रविलोचन नैना निशि -दिन मदमाती || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
चण्ड मुण्ड संहारे , शोणित -बीज हरे |
मधु -कैटभ  दोउ मारे ,सुर भय हिन करे || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
ब्रहाणी ,रूद्राणी तुम कमला रानी |
आगम -निगम बखानी तुम शिव पटरानी || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
चौसठ योगनी गावत , नृत्य करत भैरव |
बाजत ताल मृदंगा और बाजत डमरू || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
तू ही जग की माता तुम ही हो भरता|
भक्तन की दुःख हरता,सुख सम्पति -करता || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
भुजा चार अति शोभित खड्ग -खप्पर धारी |
मनवांछित पहल पावत, सेवत नर -नारी || जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी |
कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती |
श्री माल केतु में राजत कोटि रतन ज्योति ||
दोहा --- श्री अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावे |
           कहत शिवानंद स्वामी , सुख सम्पति पावे ||   
 

Tuesday, April 14, 2015

आरती ॐ जय जगदीश हरे

ओम जय जगदीश हरे,स्वामी जय जगदीश हरे,
भक्त जनो के संकट क्षण में दूर करे । ओम जय जगदीश हरे
जो ध्यावे फल पावे ,दुःख विनसे मन का,
सुख सम्पत्ति घर आवे ,कष्ट मिटे तन का । ओम जय जगदीश हरे
मात पिता तुम मेरे शरण गहूं किसकी,
तुम बिन ओर न दूजा,आस करूं जिसकी | ओम जय जगदीश हरे
तुम पूरण परमात्मा तुम अन्तर्यामी,
पार ब्रह्म परमेश्वर ,तुम सब के स्वामी | ओम जय जगदीश हरे
तुम करूणा के सागर ,तुम पालन कर्ता,
मैं मूरख खलकामी, कृपा करो भर्ता | ओम जय जगदीश हरे
तुम हो एक अगोचर , सबके प्राणपति ,
किस विधि मिळू दयामय , तुमको में कुमति | ओम जय जगदीश हरे
दिन बंधु दुख हरता , तुम रक्षक मेरे ,
अपने हाथ बढ़ाओ द्वार पड़ा तेरे | ओम जय जगदीश हरे
विषय विकार मिटाओ , पाप हरो देवा ,
श्रध्दा भक्ति बढ़ाओ , संतन की सेवा | ओम जय जगदीश हरे
तन मन धन जो कुछ है ,सब तेरा
तेरा तुझको अर्पित , क्या लागे मेरा |  ओम जय जगदीश हरे
ओम जय जगदीश हरे,स्वामी जय जगदीश हरे,
भक्त जनो के संकट क्षण में दूर करे । ओम जय जगदीश हरे |

Sunday, April 12, 2015

श्री सरस्वती जी की आरती

ओम जय विणे वाली मैया जय विणे वाली
ऋद्धि सिद्धि की रहती हाथ तेरे ताली
ऋषि मुनियो की बुद्धि को शुद्ध तू ही करती
स्वर्ण की भाती शुद्ध तू ही करती
 ज्ञान पिता को देती गगन शब्द से तू
विशव को उत्पन्न करती आदि शक्ति से तू
हंस वाहिनी दीजे भिक्षा दशर्न की
मेरे मन में केवल इच्छा दर्शन की
ज्योति जगाकर नित्य यह आरती जो गावे
भव सागर में दुःख में गोता न कभी खावे
 

Saturday, April 11, 2015

हनुमान जी की आरती


आरती कीजै हनुमान लला की।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ।
जाके बल से गिरवर कापे

देव पिशाच निकट नही झाके । आरती ...
लंका ऐसे समुद्र अस खाई ।
जात पवन सुत बार न लाये । आरती...
दे बीडा रघुनाथ पठाये ।
लंका जायी सिया सुधि लाये । आरती...
जगमग ज़्योति अवधपुर राजा ।
घंटा ताल पखावज बाजा ।आरती...
शक्ति बाण  लगयो ल॒क्ष्मण को
लाय संजीवनी ल॒क्ष्मण जिआये । आरती ...
पैठि पाताल तोरी यम कारे ।
अहिरावन के भुजा उखारे । आरती...
आरती कीजै जैसी तैसी ।
धुव्रा प्रहलाद विभीषण जैसी । आरती...
सुर नर मुनि जन आरती उतारे,
जय जय जय कपिराज उचारै । आरती...
बाई भुजा सुर असुर संहार
दाहिनी भुजा सब सन्त उबारे । आरती...
लंक प्रज्जवलित असुर संहारे
राजा राम के काज संवारे । आरती...
अंजनी पुत्र महा बलदायक
देव सन्त के सदा सहायक । आरती...
लंक विध्वंस किये रघुराई
तुलसीदास कपि आरती गावे । आरती...
जो हनुमानजी की आरती गावे,
बसि बेकुण्ठ अमर फल पावे । आरती...

Friday, March 20, 2015

सोलह सोमवार व्रत



॥ सोलह सोमवार व्रत विधि ॥


व्रत :-
यह व्रत सप्ताह के प्रथम दिवस सोमवार को रखा जाता है।
यह व्रत भगवान शिवजी के लिये रखा जाता है।

विधि:-
सोलह सोमवार के दिन भक्तिपूर्वक व्रत करें.

अधा  सेर गेहूं का आटा के तीन अंगा बनाकर घी, गुड़, दीप, नैवेद्य,
पूंगीफ़ल, बेलपत्र, जनेउ का जोड़ा, चंदन, अक्षत, पुष्प, आदि से प्रदोष काल में भगवान शिव का पूजन
करें.
एक अंगा भगवान शिव को अर्पण करें.
दो अंगाओं को प्रसाद स्वरूप बांटें, और स्वयं भी ग्रहण करें.
सत्रहवें सोमवार के दिन पाव भर गेहूं के आटे की बाटी बनाकर. घी और गुड़ बनाकर
चूरमा बनायें, भोग लगाकर उपस्थित लोगों में प्रसाद बांटें.

॥ सोलह सोमवार व्रत कथा ॥

पृथ्वी पर भ्रमण की इच्छा से भगवान शिव और पार्वतीजी अमरावती नगर में
पहुँचे। वन-उपवन और सुंदर भवनों को देखकर भगवान शिव को अमरावती नगर बहुत
अच्छा लगा। उन्होंने कुछ दिन उसी नगर में रहने के लिए कहा। पार्वती को भी
अमरावती नगर बहुत अच्छा लगा था।

उस नगर के राजा ने भगवान शिव का एक विशाल मंदिर बनवा रखा था। शिव और
पार्वती उस मंदिर में रहने लगे। एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा- ‘हे
प्राणनाथ! आज मेरी चौसर खेलने की इच्छा हो रही है।’ पार्वती की इच्छा
जानकर शिव पार्वती के साथ चौसर खेलने बैठ गए।

खेल प्रारंभ होते ही उस मंदिर का पुजारी वहाँ आ गया। पार्वती ने पुजारी
से पूछा- ‘पुजारीजी! चौसर के खेल में हम दोनों में से किसकी विजय होगी?’
उस समय शिव और पार्वती परिवर्तित रूप में थे। पुजारी ने एक पल कुछ सोचा
और झट से बोला- ‘चौसर के खेल में त्रिलोकीनाथ की विजय होगी।´ यह कहकर
पुजारी पूजा-पाठ में लग गया।

कुछ देर बाद चौसर में शिवजी की पराजय हुई और पार्वतीजी जीत गईं।
पार्वतीजी ने ब्राह्मण पुजारी के मिथ्या वचन से रुष्ट होकर उसे कोढ़ी हो
जाने का शाप दे दिया। शिव और पार्वती उस मंदिर से कैलाश पर्वत लौट गए।
पार्वती के शाप से कुछ ही देर में ब्राह्मण पुजारी का सारा शरीर कोढ़ से
भर गया। नगर के स्त्री-पुरुष उस पुजारी की परछाई से भी दूर-दूर रहने लगे।
कुछ लोगों ने राजा से पुजारी के कोढ़ी हो जाने की शिकायत की तो राजा ने
किसी पाप के कारण पुजारी के कोढ़ी हो जाने का विचार कर उसे मंदिर से
निकलवा दिया। उसकी जगह दूसरे ब्राह्मण को पुजारी बना दिया।
कोढ़ी पुजारी मंदिर के बाहर बैठकर भिक्षा माँगने लगा। कई दिन बाद
स्वर्गलोक की कुछ अप्सराएँ उस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आईं।
कोढ़ी पुजारी पर उनको बहुत दया आई। उन्होंने पुजारी से उस भयंकर कोढ़ के
बारे में पूछा। पुजारी ने उन्हें भगवान शिव और पार्वतीजी के चौसर खेलने
और पार्वतीजी के शाप देने की सारी कहानी सुनाई।
शाप की कहानी सुनकर अप्सराओं ने पुजारी से कहा कि तुम सोलह सोमवार का
विधिवत व्रत करो। तुम्हारे सभी कष्ट, रोग-विकार शीघ्र नष्ट हो जाएँगे।
पुजारी द्वारा पूजन विधि पूछने पर अप्सराओं ने कहा- ‘सोमवार के दिन
सूर्योदय से पहले उठकर, स्नानादि से निवृत्त होकर, स्वच्छ वस्त्र पहनकर,
आधा सेर गेहूँ का आटा लेकर उसके तीन अंग बनाना। फिर घी का दीपक जलाकर
गुड़, नैवेद्य, बेलपत्र, चंदन, अक्षत, फूल, पूंगीफल, जनेऊ का जोड़ा लेकर
प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करना। पूजा के बाद तीन अंगों
में एक अंग भगवान शिव को अर्पण करके शेष दो अंगों को भगवान का प्रसाद
मानकर वहाँ उपस्थित स्त्री, पुरुषों और बच्चों को बाँट देना।

इस तरह व्रत करते हुए जब सोलह सोमवार बीत जाएँ तो सत्रहवें सोमवार को एक
पाव आटे की बाटी बनाकर, उसमें घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनाना। फिर भगवान
शिव को भोग लगाकर वहाँ उपस्थित स्त्री, पुरुष और बच्चों को प्रसाद बाँट
देना। इस तरह सोलह सोमवार व्रत करने और व्रतकथा सुनने से भगवान शिव
तुम्हारे कोढ़ को नष्ट करके तुम्हारी सभी मनोकामनाएँ पूरी कर देंगे। इतना
कहकर अप्सराएँ स्वर्गलोक को चली गईं।

पुजारी ने अप्सराओं के कथनानुसार विधिवत सोलह सोमवार का व्रत किया
फलस्वरूप भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका कोढ़ नष्ट हो गया। राजा ने उसे
फिर मंदिर का पुजारी बना दिया। मंदिर में भगवान शिव की पूजा करता हुआ
ब्राह्मण पुजारी आनंद से जीवन व्यतीत करने लगा।

कुछ दिनों बाद पुन: पृथ्वी का भ्रमण करते हुए भगवान शिव और पार्वती उस
मंदिर में पधारे। स्वस्थ पुजारी को देखकर पार्वती ने आश्चर्य से उसके
रोगमुक्त होने का कारण पूछा तो पुजारी ने उन्हें सोलह सोमवार व्रत करने
की सारी कथा सुनाई।

पार्वतीजी भी व्रत की बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने पुजारी से
इसकी विधि पूछकर स्वयं सोलह सोमवार का व्रत प्रारंभ किया। पार्वतीजी उन
दिनों अपने पुत्र कार्तिकेय के नाराज होकर दूर चले जाने से बहुत चिन्तित
रहती थीं। वे कार्तिकेय को लौटा लाने के अनेक उपाय कर चुकी थीं, लेकिन
कार्तिकेय लौटकर उनके पास नहीं आ रहे थे।

सोलह सोमवार का व्रत करते हुए पार्वती ने भगवान शिव से कार्तिकेय के
लौटने की मनोकामना की। व्रत समापन के तीसरे दिन सचमुच कार्तिकेय वापस लौट
आए। कार्तिकेय ने अपने हृदय-परिवर्तन के संबंध में पार्वतीजी से पूछा-
‘हे माता! आपने ऐसा कौन-सा उपाय किया था, जिससे मेरा क्रोध नष्ट हो गया
और मैं वापस लौट आया?’ तब पार्वतीजी ने कार्तिकेय को सोलह सोमवार के व्रत
की कथा कह सुनाई।

कार्तिकेय अपने एक ब्राह्मण मित्र ब्रह्मदत्त के परदेस चले जाने से बहुत
दुखी थे। वह वापस नहीं आ रहा था। उसको वापस लौटाने के लिए कार्तिकेय ने
सोलह सोमवार का व्रत करते हुए ब्रह्मदत्त के वापस लौट आने की कामना प्रकट
की। व्रत के समापन के कुछ दिनों के बाद मित्र लौट आया।

ब्रह्मदत्त ने लौटकर कार्तिकेय से कहा- ‘प्रिय मित्र! तुमने ऐसा कौन-सा
उपाय किया था जिससे परदेस में मेरे विचार एकदम परिवर्तित हो गए और मैं
तुम्हारा स्मरण करते हुए लौट आया?’ कार्तिकेय ने अपने मित्र को भी सोलह
सोमवार के व्रत की कथा-विधि कह सुनाई। ब्राह्मण मित्र व्रत के बारे में
सुनकर बहुत खुश हुआ। उसने भी व्रत करना शुरू कर दिया।

सोलह सोमवार व्रत का समापन करने के बाद ब्रह्मदत्त यात्रा पर निकला। कुछ
दिनों बाद ब्रह्मदत्त एक नगर में पहुँचा। नगर के राजा हर्षवर्धन की बेटी
राजकुमारी गुंजन का स्वयंवर हो रहा था। उस स्वयंवर में अनेक राज्यों के
राजकुमार आए थे। स्वयंवर में राजा हर्षवर्धन की हथिनी जिसके गले में
जयमाला डाल देगी, उसी के साथ राजकुमारी का विवाह होना था।

ब्रह्मदत्त भी उत्सुकतावश महल में चला गया। वहाँ कई राज्यों के राजकुमार
बैठे थे। तभी एक सजी-धजी हथिनी सूँड में जयमाला लिए वहाँ आई। उस हथिनी के
पीछे राजकुमारी गुंजन दुल्हन की वेशभूषा में चल रही थी। हथिनी ने
ब्रह्मदत्त के गले में जयमाला डाल दी फलस्वरूप राजकुमारी का विवाह
ब्रह्मदत्त से हो गया।

सोलह सोमवार व्रत के प्रभाव से ब्रह्मदत्त का भाग्य बदल गया। ब्रह्मदत्त
को राजा ने बहुत-सा धन और स्वर्ण आभूषण देकर विदा किया। अपने नगर में
पहुँचकर ब्रह्मदत्त आनंद से रहने लगा। एक दिन उसकी पत्नी गुंजन ने पूछा-
‘हे प्राणनाथ! आपने कौन-सा शुभकार्य किया था जो उस हथिनी ने राजकुमारों
को छोड़कर आपके गले में जयमाला डाल दी।’ ब्रह्मदत्त ने सोलह सोमवार व्रत
की सारी कहानी बता दी।

अपने पति से सोलह सोमवार का महत्व जानकर राजकुमारी गुंजन ने पुत्र की
इच्छा से सोलह सोमवार का व्रत किया। निश्चित समय पर भगवान शिव की
अनुकम्पा से राजकुमारी के एक सुंदर व स्वस्थ पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र का
नामकरण गोपाल के रूप में हुआ। दोनों पति-पत्नी सुंदर पुत्र को पाकर बहुत
खुश हुए। पुत्र ने भी माँ से एक दिन प्रश्न किया कि मैंने तुम्हारे ही घर
में जन्म लिया इसका क्या कारण है। माता गुंजन ने पुत्र को सोलह सोमवार
व्रत की जानकारी दी और कहा कि भगवान शिव के आशीर्वाद से ही मुझे तुम जैसा
गुणी व सुंदर पुत्र मिला है।

व्रत का महत्व जानकर गोपाल ने भी व्रत करने का संकल्प किया। गोपाल जब
सोलह वर्ष का हुआ तो उसने राज्य पाने की इच्छा से सोलह सोमवार का विधिवत
व्रत किया। व्रत समापन के बाद गोपाल घूमने के लिए समीप के नगर में गया।
उस नगर के राजा के महामंत्री राजकुमार के विवाह के लिए सुयोग्य वर की
तलाश में निकले थे।

राजा ने गोपाल को देखा तो बहुत प्रसन्न हुए। फिर गोपाल से उसके माता-पिता
के संबंध में बातें करके, उसे अपने साथ महल में ले गए। वृद्ध राजा ने
गोपाल को पसंद किया और बहुत धूमधाम से राजकुमारी का विवाह उसके साथ कर
दिया। सोलह सोमवार के व्रत करने से गोपाल महल में पहुँचकर आनंद से रहने
लगा।

दो वर्ष बाद राजा का निधन हो गया तो गोपाल को उस नगर का राजा बना दिया
गया। इस तरह सोलह सोमवार व्रत करने से गोपाल की राज्य पाने की इच्छा
पूर्ण हो गई। राजा बनने के बाद भी गोपाल विधिवत सोलह सोमवार का व्रत करता
रहा। व्रत के समापन पर सत्रहवें सोमवार को गोपाल ने अपनी पत्नी मंगला से
कहा कि व्रत की सारी सामग्री लेकर वह समीप के शिव मंदिर में पहुँचे।
मंगला ने पति की बात की परवाह न करते हुए सेवकों द्वारा पूजा की सामग्री
मंदिर में भेज दी। मंगला स्वयं मंदिर नहीं गई। जब गोपाल ने भगवान शिव की
पूजा पूरी की तो आकाशवाणी हुई- ‘हे राजन्! तेरी रानी मंगला ने सोलह
सोमवार व्रत का अनादर किया है। सो रानी को महल से निकाल दे, नहीं तो तेरा
सब वैभव नष्ट हो जाएगा। तू निर्धन हो जाएगा।’

आकाशवाणी सुनकर गोपाल बुरी तरह चौंक पड़ा। उसने तुरंत महल में पहुँचकर
अपने सैनिकों को आदेश दिया कि रानी मंगला को बंदी बनाकर ले जाओ और इसे
दूर किसी नगर में छोड़ आओ।´ सैनिकों ने राजा की आज्ञा का पालन तत्काल कर
दिया। मंत्रियों ने राजा से प्रार्थना की कि वे रानी को अन्यत्र न भेजें
तब राजा गोपाल ने आकाशवाणी वाली बात बताई तो वे भी भगवान शिव के प्रकोप
के भय से शांत होकर रह गए।

रानी मंगला भूखी-प्यासी उस नगर में भटकने लगी। मंगला को उस नगर में एक
बुढ़िया मिली। वह बुढ़िया सूत कातकर बाजार में बेचने जा रही थी, लेकिन उस
बुढ़िया से सूत उठ नहीं रहा था। बुढ़िया ने मंगला से कहा- ‘बेटी! यदि तुम
मेरा सूत उठाकर बाजार तक पहुँचा दो और सूत बेचने में मेरी मदद करो तो मैं
तुम्हें धन दूँगी।’

मंगला ने बुढ़िया की बात मान ली। लेकिन जैसे ही मंगला ने सूत की गठरी को
हाथ लगाया, तभी जोर की आँधी चली और गठरी खुल जाने से सारा सूत आँधी में
उड़ गया। मंगला को मनहूस समझकर बुढ़िया ने उसे दूर चले जाने को कहा।
मंगला चलते-चलते नगर में एक तेली के घर पहुँची। उस तेली ने तरस खाकर
मंगला को घर में रहने के लिए कह दिया लेकिन तभी भगवान शिव के प्रकोप से
तेली के तेल से भरे मटके एक-एक करके फूटने लगे। तेली ने मंगला को मनहूस
जानकर तुरंत घर से निकाल दिया।

भूखी-प्यासी रानी वहाँ से आगे की ओर चल पड़ी। रानी ने एक नदी पर जल पीकर
अपनी प्यास शांत करनी चाही तो नदी का जल उसके स्पर्श से सूख गया। अपने
भाग्य को कोसती हुई रानी आगे चल दी। चलते-चलते रानी एक जंगल में पहुँची।
उस जंगल में एक तालाब था। उसमें निर्मल जल भरा हुआ था। निर्मल जल देखकर
रानी की प्यास तेज हो गई। जल पीने के लए रानी ने तालाब की सीढ़ियाँ उतरकर
जैसे ही जल को स्पर्श किया, तभी उस जल में असंख्य कीड़े उत्पन्न हो गए।
रानी ने दु:खी होकर उस गंदे जल को पीकर अपनी प्यास शांत की।

दोपहर की धूप से परेशान होकर रानी ने एक पेड़ की छाया में बैठकर कुछ देर
आराम करना चाहा तो उस पेड़ के पत्ते पलभर में सूखकर बिखर गए। रानी दूसरे
पेड़ के नीचे जाकर बैठी तो उस पेड़ के पत्ते भी गिर गए। रानी तीसरे पेड़
के पास पहुँची तो वह पेड़ ही नीचे गिर पड़ा।

पेड़ों के विनाश को देखकर वहाँ पर गायों को चराते ग्वाले बहुत हैरान हुए।
ग्वाले मनहूस रानी को पकड़कर समीप के मंदिर में पुजारीजी के पास ले गए।
रानी के चेहरे को देखकर ही पुजारी जान गए कि रानी अवश्य किसी बड़े घर की
है। भाग्य के कारण दर-दर भटक रही है।

पुजारी ने रानी से कहा- ‘पुत्री! तुम कोई चिंता नहीं करो। मेरे साथ इस
मंदिर में रहो। कुछ ही दिनों में सब ठीक हो जाएगा।’ पुजारी की बातों से
रानी को बहुत सांत्वना मिली। रानी उस मंदिर में रहने लगी, लेकिन उसके
भाग्य में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

रानी भोजन बनाती तो सब्जी जल जाती, आटे में कीड़े पड़ जाते। जल से बदबू
आने लगती। पुजारी भी रानी के दुर्भाग्य से बहुत चिंतित होते हुए बोले-
‘हे पुत्री! अवश्य ही तुझसे कोई अनुचित काम हुआ है। जिसके कारण देवता
तुझसे नाराज होकर, तुझे इतने कष्ट दे रहे हैं।’ पुजारी की बात सुनकर रानी
ने अपने पति के आदेश पर मंदिर में न जाकर, शिव की पूजा नहीं करने की सारी
कथा सुनाई।

पुजारी ने कहा- ‘अब तुम कोई चिंता नहीं करो। कल सोमवार है और कल से तुम
सोलह सोमवार के व्रत करना शुरू कर दो। भगवान शिव अवश्य तुम्हारे दोषों को
क्षमा करके तुम्हारे भाग्य को बदल देंगे।’ पुजारी की बात मानकर रानी ने
सोलह सोमवार के व्रत प्रारंभ कर दिए। सोमवार को व्रत करके, विधिवत शिव की
पूजा-अर्चना करके रानी व्रतकथा सुनने लगी।

जब रानी ने सत्रहवें सोमवार को विधिवत व्रत का समापन किया तो उधर उसके
पति राजा गोपाल के मन में रानी की याद आई। गोपाल ने तुरंत अपने सैनिकों
को रानी मंगला को ढूँढकर लाने के लिए भेजा। रानी को ढूँढते हुए सैनिक
मंदिर में पहुँचे और रानी से लौटकर चलने के लिए कहा। पुजारी ने सैनिकों
से मना कर दिया और सैनिक निराश होकर लौट गए। उन्होंने लौटकर राजा को सारी
बातें बताईं।

राजा गोपाल स्वयं उस मंदिर में पुजारी के पास पहुँचे और रानी को महल से
निकाल देने के कारण पुजारीजी से क्षमा माँगी। पुजारी ने राजा से कहा- ‘यह
सब भगवान शिव के प्रकोप के कारण हुआ है। इसलिए रानी अब कभी भगवान शिव की
पूजा की अवहेलना नहीं करेगी।’ पुजारीजी ने समझाकर रानी मंगला को विदा
किया।

राजा गोपाल के साथ रानी मंगला महल में पहुँची। महल में बहुत खुशियाँ मनाई
गईं। पूरे नगर को सजाया गया। लोगों ने उस रात दिवाली की तरह घरों में
दीपक जलाकर रोशनी की। ब्राह्मणों ने वेद-मंत्रों से रानी मंगला का स्वागत
किया। राजा ने ब्राह्मणों को अन्न, वस्त्र और धन का दान दिया। नगर में
निर्धनों को वस्त्र बाँटे गए।

रानी मंगला सोलह सोमवार का व्रत करते हुए महल में आनंदपूर्वक रहने लगी।
भगवान शिव की अनुकम्पा से उसके जीवन में सुख ही सुख भर गए। सोलह सोमवार
के व्रत करने और कथा सुनने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और
जीवन में किसी तरह की कमी नहीं होती है। स्त्री-पुरुष आनंदपूर्वक
जीवन-यापन करते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

 

Tuesday, March 17, 2015

आंवला नवमी की कहानी


एक राजा था वो रोज सोना का आंवला  ब्राह्मण को दान करता था जिसका बाद रोज दोनों जना जीमता  | अब एक दिन राजा का बेटा बहू धन  की तिजोरी में ताला लगादियो  और पिताजी के बोल्या  कि अब तुम आवला धर्म नही कर सकोगे अब राजा रानी जंगल में जाकर बैठ  गया सात दिन हो गए जब तक आंवला दान नही करे तब तक कुछ खाये नही भगवान राधा दामोदरजी बोल्या अपन इसको सत नही रखा गा तो अपनी बात कोन मानेगा | राजा रानी के भगवान ने सपनो दियो कि तू उठ देख सोना को महल राजा सा ठाट बाट महल में सोना को आंवला अब वोतो रोज दोनो जना सोना को आंवला दान करे और प्रेम से रेवे है इधर बूह का घर में तो खाने को दाना भी नही बचा है सब बोल्या  जंगल में एक सोना को महल है वह पर राजा रानी रोज सोना को आंवलों दान करे है अब वो राजा को लड़को उसी राजा का महल में गयो और बोल्यो महल में म्हारे भी नौकरी पर रख लो  अब बेटा बहू दोनों के नौकरी पर रख लिया | एक दिन बहू से रानी बोली म्हारे निलादे व सिर धोने लगी तो बहु के आँख में से पानी गिरयो  तब रानी बोली की तू म्हारी पीठ पर आँसू क्यों गिरावे क्या बात है तू बतादे | जब वा बहू बोली  की मेरी भी सासू की पीठ पर ऐसे ही मसो थो | यो मसो देखकर |

मारी सासू माँ की याद आ गई वा भी रोज सोना को आंवलों देकर जीमती थी | वो म्हेलोग आंवलों  नही देने दियो और घर से निकाल दिया तब वे राजा रानी बोल्या की मे ही तेरा सासू सुसरा हां  तुमने म्हारे निकल दियो फिर भी म्हारी सत तो भगवान ने ही रखी है वे ही राजा रानी और बेटा बहू सब एक जगह अच्छी तरह से रहने लग्या है | राधा दामोदर  भगवान राजा रानी के टुट्या जैसे सबके टूट जो सुनता हुंकारा भरता |

Wednesday, September 17, 2014

श्री हनुमानचालीसा



दोहा 
श्रीगुरू चरण सरोज रज
निज मनु मुकुरू सुधारि |
बरनउँ रघुबर बिमल जसु
जो दायकु फल चारि ||
बुदिध्हीन  तनु जानिके ,
सुमिरौ पवन कुमार |
बल  बुद्धि विघा देहू मोहि ,
हरहु कलेस बिकार ||
                                                                    
चौपाई 
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर |
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ||
राम दूत अतुलित बल धामा |
अंजनी -पुत्र  पवन सूत नामा ||
महाबीर विक्रम बजरंगी
कुमति निवार सुमति के संगी ||
 कंचन  बरन  बिराज सुबेसा |
कानन कुंडल कुंचित केसा ||
 हाथ बज्र ओ ध्वजा बिराजे |
काँधे मूँज जनेऊ साजै ||
संकर सुवन केसरी नंदन |
तेज प्रताप महा जग बंदन ||
बिद्यावान गुनी अति चातुर|
राम काज करिबे को आतुर ||
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया |
राम लषन सीता मन बसिया |
सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा |
बिकट रूप धरि लंक जरावा ||
भीम रूप धरि असुर संहारे |
रामचन्द्र के काज संवारे
लाय सजीवन लखन जियाजे |
श्री रघुबीर हरषि उर लाये ||
रघुपति किन्ही बहुत बड़ाई |
तुम मम प्रिय भरतही सम भाई ||
शस बदन तुम्हरो जस गावै |
अस कहि श्रीपति कंठ लगावें||
सनकादिक ब्रम्हादि मुनीसा |
नारद सारद सहित अहीसा ||
जम कुबेर दिगपाल जहां ते |
कबि कोबिद कहि सके कहा ते ||
तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा|
राम मिलायराज पद दीन्हा ||
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना|
लंकेस्वर भए सब जग जाना ||
जग सहस्त्र जोजन  पर भानू |
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ||
प्रभु  मुद्रिका मिली मुख माहि |
जलधि लाँघि गये अचरज नाही ||
दुर्गम काज जगत के जेते |
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ||
राम दुआरे तुम रखवारे |
होता  न आज्ञा बिनु पैसारे ||
सब सुख लहै तुम्हारी सरना |
तुम रच्छक कहू को डर ना |
आपन तेज सम्हारो आपै |
तीनो लोक हांकते कांपे ||
भूत पिसाच निकट नही आवै |
महावीर जब नाम सुनावै ||
नासै रोग शै सब पीरा |
जपत निरंतर हनुमत बीरा ||
संकट ते हनुमान  छुड़ावै |
मन कर्म वचन ध्यान जो लावै ||
सब पर राम तपस्वी राजा |
तीन के काज सकल तुम सजा ||
और मनोरथ जो कोई लावै |
सोइ  अमित जीवन फल पावै ||
चारो जग प्रताप तुम्हारा |
है प्रसिद्ध जगत उजियारा ||
साधु संत के तुम रखवारे |
असुर निकंदन राम दुलारे ||
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता |
अस बर दिन जानकी माता ||
राम रसायन तुम्हरे पासा |
सदा रहो रघुपति के दासा ||
तुम्हारे भजन राम को पावै |
जन्म जन्म के दुःख बिसरावै ||
अंत काल सघुबर पर जाई |
जहां जन्म हरि- भक्त कहाई||
और देवता चित न धरि  |
हनुमत सेइ सब सुख करें ||
संकट कटै मिटै सब पीरा |
जो सुमिरै हनुमत  बलवीरा ||
जै जै जै हनुमान गोसाई |
कृपा करहु गुरू देव की नाई ||
जो सत बार पाठ कर कोई |
छूटहि बंदी महा सुख होई||
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा |
होय सिद्धि साखी गौरीसा ||
तुलसीदास सदा हरि चेरा |
कीजै नाथ ह्रदय मन डेरा ||

दोहा
पवनतनय संकट हरन ,
मंगल मूर्ती रूप |
राम लखन सीता सहित ,
ह्रदय बसहु सुर भूप ||

Thursday, September 4, 2014

गणेशजी की आरती


जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा |
माता जाकी पार्वती, पिता महादेव ||
जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा |
एक दंत दयावन्त , चार भुजाधारी |
माथे पे सिन्दूर सोहे, मूसे की सवारी ||
जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा |
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया |
बाँझन को पुत्र देत , निर्धन को माया ||
जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा |
हार चढ़ै. फूल चढ़ै और चढ़ै मेवा |
लड्डुअन का भोग ,लागे संत करे सेवा ||
जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा |
दीनन की लाज रखो शम्भु सुतवारी |
कामना को पूरा करो जग बलिहारी ||
जय गणेश जय गणेश ,जय गणेश देवा |
कारज को सिद्ध करो , कष्टो को दूर करो |
जय गणेश श्री गणेश ,जय गणेश देवा |
माता जाकी पार्वती, पिता महादेव ||

Sunday, April 20, 2014

विनायकजी की कहानी

एक राक्षस था वह सभी मनुष्य को बहुत दुख देता था कही भी यज्ञ , दान , धर्म नही करने देता था सब लोग बड़ी तकलीफ में था सबने मिलकर गणेशजी की आराधना करी , तब गणेशजी बोले क्या बात है ? सब लोग इतना दुखी क्यों है ? तब सब बोले की राक्षस बहुत  दुख देवे है , इसको पाप भी कटनो है  राक्षस  ने मारने के लिए गणेशजी ने लड़ाई करी है | लड़ता लड़ता  राक्षस   मर गयो और गणेशजी लड़ता -लड़ता खूब गर्म हो गए तो सब घबराने लगे तो गणेशजी ने सबको समझाया और अपना असली रूप दिखाया तो सबने गणेशजी के हाथ जोड़े और गणेशजी की पूजा करी | गणेशजी बहुत प्रसन्न हो गए | सबने सुख - शान्ति हुई है |

गणेशजी महाराज कहता सुनता हुंकार भरता अधूरी होय तो पूरी करजो पूरी होय तो मान करजो |

Wednesday, March 26, 2014

गणगोर की कहानी









एक बार पार्वतीजी  शंकर  भगवान   के साथ  पीयर जाने  को निकली । तो शिवजी बोल्या कि मे भी आपके साथ  चलू ,तब पार्वती जी बोली मैं आपके साथ नही चलू  मेरे को शर्म आएगी तो शिवजी बोल्या  घूघंट निकाल लेना पार्वतीजी बोली मेरे को तो गर्मी लगे इतनो कहकर पतला कपड़ा ओढ़कर दोनों पियर जाने लगे रास्ते में एक गाय उठक -बैठक कर रही थी ,जब पार्वती जी बोली कि ये गाय क्यों कष्टी शिवजी ने कहा इस गाय के बच्चो होने वाला है ,इसलिए या इतनी कष्टी है |पार्वती जी कहने लगी इतनो दुख होवे तो म्हारे बच्चो नही चाहिए म्हारे तो गांठ दे दो ,शिवजी बोले आगे चलो | आगे गया तो घोड़ी  उठक -बैठक कर रही थी , जब पार्वती बोली या इतनी कष्टी क्यों है शिवजी ने कहा इस घोड़ी के बच्चो होने वाला है ,इसलिए या इतनी कष्टी है |पार्वती जी कहने लगी इतनो दुख  होवे तो म्हारे बच्चो नही चाहिए म्हारे तो गांठ दे दो ,शिवजी बोले आगे चलो | आगे गया तो एक राजा कि नगरी मे वहा पर सब उदास बैठ्या था ढोल बाजा उलटा पड़े थे पार्वती ने पूछा यहा सारी नगरी उदास क्यों है शिवजी ने कहा रानी को बच्चो होने वाला है और वा कष्टी है इस कारण सब उदास है | पार्वती जी बोली बच्चो के लिए इतनो कष्ट देखनो पड़े , तो म्हारे तो बच्चो नही चाहिए ,आप तो गाठ दे दो महाराज | लेकिन शिवजी ने गाठ नही दी और आगे चलते गये तो पार्वती जी ने अगर आप गाठ नही दो तो मे आगे नही चलू  शिवजी ने गाठ दे दी | और दोनों पीयर पहूँच गये वहा सब ओरतें पूजा कर रही थी वे सब कहने लगी शिवजी और पार्वती जी आ गये चलो पूजा करे , इधर सब सालियाँ खाना खाते वक्त शिवजी से मजाक करने लगी  तो शिवजी ने पूरा ही खाना खा लिया बाकी बचा हूया नंदी के लिए ले लिया और पीपल के निचे जाकर सो गये | पार्वती माँ से बोली माँ मेरे को भूख लगी तो माँ बोली पूरा खाना तो शिवजी खा गये पार्वतीजी ने सुखा बथुआ कि रोटी खा ली और एक लोटा पानी पीकर विदा हो गई रास्ते मे शिवजी ने पूछा आप ने क्या खाया तो पार्वतीजी ने कहा जो आपने खाया वही मेने खाया और पार्वतीजी को नींद आ गई तो शिवजी ने उनके पेट कि ढकनी खोल कर देखा उसमे सूखी बथुआ कि रोटी और एक  लोटा पानी था पार्वती कि नींद खुली तब शिवजी बोले रानी क्या खाया फिर बोली जो आप ने खाया वही  मेने खाया शिवजी बोले पार्वतीजी मेने आपके पेट कि ढकनी खोलकर देखी तो उसमे सूखा बथुआ कि रोटी और एक लोटा पानी था तब पार्वतीजी बोली आज तो आपने मेरी ढकनी खोली आगे से किसी ओरत कि ढकनी नही खुलनी चाहिए |कोई को पियर गरीब होय कोई को अमीर होय | पियर कि बात ससुराल में और ससुराल कि बात पीयर में नही कहना चाहिए उस दिन से सब कि ढकनी बंद हो गई | पार्वतीजी पानी लेने गया गाँव कि सारी औरता ईश्वरजी कि पूजा करने लगी तो शिवजी ने यहा पर सुहाग कुंडा सब औरता के बाँट दियो इतना में पार्वतीजी बोली ये आपने क्या करा बान्यारी औरता तो पैर ओढ़कर अब आएगी | आप इसकी चिंता मत कीजिए। उन स्त्रियों को मैंने केवल ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया है। इसलिए उनका रस धोती से रहेगा। परंतु मैं इन उच्च कुल की स्त्रियों को अपनी उँगली चीरकर अपने रक्त का सुहाग रस दूँगी। यह सुहाग रस जिसके भाग्य में पड़ेगा, वह तन-मन से सौभाग्यवती हो जाएगी। जब स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर दिया, तब पार्वतीजी ने अपनी उँगली चीरकर उन पर छिड़क दी। जिस पर जैसा छींटा पड़ा, उसने वैसा ही सुहाग पा लिया अब राजा कि नगरी में पहूँचे तो वहा सब दूर उत्सव हो रहा था पार्वतीजी ने पूछा यहा कैसा उत्सव शिवजी बोले रानी के लड़का हुआ इसलिए यहा ख़ुशी मनाई जा रही है  तो पार्वतीजी बोली महाराज मेरी तो गाठ खोल दो मेरे को भी बच्चा चाहिए शिवजी बोले आगे चलो तो गाय खड़ी हुई बछड़ा को चाट रही थी पार्वतीजी बोली मेरी तो गाठ खोल दो शिवजी बोले आगे चलो ऐसा करते करते घर आ गया गाठ नही खुली शिवजी बारह बरस के लिए वन में चले गये एक दिन पार्वती जी बहुत उदास बैठे थे ,बैठे बैठे अपना शरीर का मैल निकालने लगे तो बहुत सा मैल इकट्ठा हो गया तब पार्वतीजी ने मैल का पुतला बनाया  और अमृत को छीटा दिया  छीटा डालते ही लड़का ज़िंदा हो गया | एक दिन पार्वती नहाने बैठा और लड़का को दरवाजा के पास बैठा दिया बोला कि अंदर किसी को मत आने देना यह कह कर पार्वतीजी नहाने चली गई | इधर शिवजी कि तपस्या पूरी हुई और घर आ गये तो लड़का बोला  मेरी माँ नहाने गई है अंदर मत जाओ ,शिवजी बोले थारी माँ कोन है ? लड़का बोला मेरी माँ पार्वतीजी है  शिवजी को बहुत क्रोध आयो और मन में सोचा कि मैं तो बारह बरस से तपस्या करने वन मे  गयो, तो यह कैसे हुयो ? ऐसा कहकर लड़का कि गरदन काट दी और अंदर चले गये | शिवजी को देख पार्वती जी बोली कि मैने तो बाहर कुंवर को बैठाया था , आप  अंदर कैसे आये शिवजी बोले आपके लड़को कब हुओ ? मे तो उसकी गरदन काट कर अंदर आयो | ये सुनकर पार्वतीजी विलाप करने लगी तो शिवजी ने दूत भेजा कि कोई माँ अपना बच्चा के पीठ देकर सोई हो उसकी गरदन काटकर ले आना दूत सब और घूमा परन्तु उसको कोई नही दिखा ,बस हथनी अपना बच्चा के पीठ देकर सोई थी | वह उसकी गरदन काट कर ले आयो और कुंवर के लगा दी ,अमृत के छीटा से कुंवर ज़िंदा हो गया | पार्वती जी बोली कि मेरा लड़का के तो सब चिढ़ाएगा ,तब शिवजी ने लड़का के वरदान दियो की सब लोग पहले आपके लड़का कि पूजा करेगा | इतनो सुनकर पार्वतीजी बहुत खुश हुई तभी से किसी भी काम कि शुरूआत में गणेश जी कि पूजा होती है |

Sunday, March 16, 2014

गणेशजी की कहानी




एक मेंढ़क - मेंढ़की सरवर कि पाल पर रहते थे मेंढ़क दिनभर टर्र टर्र करता था तो मेंढ़की बोली कि मरया टर्र टर्र क्यों करे जय विनायक , जय विनायक कर |  अब राजा के बेल का पाँव टुट्यो तो सरवर कि पाल को गारा लाकर बरतन में भरकर चढ़ा दियो | उस गारा में मेंढ़क - मेंढ़की दोनों ही आ गया और उबलने लगे मेंढ़क बोला में तो मरने लगा , मेंढ़की बोली मेने तो पहले ही कहा था टर्र टर्र छोड़ जय विनायक बोल तो मेंढ़क जय विनायकजी , जय विनायकजी बोलने लगा तो वह  बरतन  टूट गया और दोनों पाल पर जाकर बैठ गये | है विनायक जी उसको टूटे ऐसे सबको टूटना |

कहानी के बाद बोलना

आड़ी-बाड़ी सोना कि बाड़ी , जीमे बैठी कान कुमाड़ी,
कान कुमाड़ी काई मांगे ,छतीस ही करोड़ देवता की |
बाडीजी सिया काई  होवे अन्न  होय ,धन होय, लाज होय ,
लक्ष्मी होवे , बिछड्या न मेलो होय , निपुत्र ने पुत्र होय
सासू को पुरसन , बहू को जीमन , उठ भाई तपसी जीम भाई लपसी
 भाई  को थान,भाभी को  मान थारे थारी बार्ता को फल
और मारे बरत को फल |

Saturday, March 15, 2014

(बैशाख माह) चतुर्थी की कहानी

एक साहूकार थो , उसका एक बेटा और एक बहु थी तो वा रोज रोटी बनाकर जीम कर बाहर आती तो पड़ोसन पूछती बहु कई  जिम्या तो वो बोली ठंडो-- बासो | ऐसा करते करते बहुत दिन हो गया | एक दिन उस साहूकार का बेटा ने सुन्यो तो वो बोल्यो कि माँ आज तो मेहमान आवेगा,सो अच्छा--अच्छा भोजन बनाओ तो माँ ने अच्छा अच्छा पकवान बनाया और बेटा से बोली कि बुला थारा मेहमान के | जब वो बोल्यो माँ चार थाली लगाओ अपन ही मेहमान है चारो जना साथ जीमने बैठ्या | जीमकर बाहर निकली कि बहु जिमी हां पड़ोसन जिमी , कई जिमी तो बहु बोली ठण्डी बासी | तब वो लड़को बोल्यो आज तो म्हारा साथ मे जीमने बेठी काई बात है ? जब वो अपनी औरत से बोल्यो कि तू रोज या काई बात बोले है कि ठंडो --बासी जब वा बोली कि आपकी कमाई नही , आपका बाप कि कमाई नही या तो बड़ा बूढ़ा कि कमाई है ,जिस दिन आप कमाओगा उस दिन ताजा भोजन होवेगा |
 एक दिन वो लड़को बोल्यो कि माँ में तो विदेश कमाने जाऊगा | माँ ने मना कियो कि बेटा अपना घर में ही खूब धन है तू बाहर मत जा |तो भी वो लड़का माना नहीं और विदेश चला गया और अपनी औरत के बोल के गया कि मे जब तक नही आउ तब तक दिया कि और चूल्हा दोनों की आग नही बुझनी चाहिए | अब एक दिन दोनों कि आग बुझ गई तो वा दौड़ी--दौड़ी  पड़ोसन के यहा आग लेने गई तो पड़ोसन चौथ कि पूजा कर रही थी , तो  बहु बोली कि म्हारे जल्दी से आग दे दो म्हारी सासू आवेगी तो लड़ेगी और म्हारा घर वाला कमाने बहार गया है वा बहु बोली कि चौथ कि पूजा से कई होवे ? वा बोली पूजा से अन्न होय,धन्न होय ,लक्ष्मी होय ,बर्कत होय, निपुत्र के पुत्र होय ,बिछड़ा ने मेल होय |तब बहु बोली कि म्हारे कैसे मालूम पड़ेगी कि आज चौथ है | म्हारी सासु तो कही भी बाहर नही जाने देवे और म्हारे आदमी भी बाहर गया है अभी तक कोई खबर नही है पड़ोसन बोली कि तू तो चौथमाता को बरत कर और उसी दिन से रोज एक टिपकी दीवाल पर लगा दे | ऐसी तीस टिपकी पूरी हो जाय तो  उस दिन चौथ को बरत कर लीजे जब से वा हमेशा चौथ करती | चौथ का दिन दमड़ी को घी और गुड लाकर अपना घर पर चौथ मांडकर पूजा करती और रात को चंद्रमा को अरग देकर जीमती उसकी सासु  चार टाइम खाना देती थी चौथ का दिन एक टाइम पनिहारी के देती ,एक टाइम पाड़ा के देती , एक टाइम कि बाड़ा में गढ़ा खोद  गाड़ देती और चौथी टाइम कि जीम लेती थी |

अब उसको चौथ करते करते बहुत दिन हो गया एक दिन उसका आदमी के चौथ माता ने सपनो दियो कि मानवी सूतो कि जागे मे तो सूतो भी नी और जागू भी नी चिंता में  मे पड़ा हूँ थारी चिंता मिटा और घर जा वहा पर सब तेरा इन्तजार कर रहे है वो आदमी बोल्यो माता में घर कैसे जाऊ मेरा लेना देना बहुत बाकी है  चौथमाता बोली सुबह उठकर कंकु , केशर का पग लिया ,मांडकर बैठ जाजे तो लेने वाला ले जायेगा  और देने वाला दे जाएगा सुबह उठ कर बैठ गयो लेने वाला ले गया और देनेवाला दे गया |

अब वह अपने घर के लिए निकला रास्ते में एक साँप जलने के लिए जा रहा था उस साहूकार ने उसको हटा दिया सर्प ने कहा मेरी तो उम्र पूरी हो गई थी और मे जलने जा रहा था तब वो बोल्यो कि अभी मत डस म्हारे घर जाने दे सर्प ने कहा वचन दे उसने वचन दिया अब वह घर आयो और आकर उदास बैठ गयो और चुपचाप सो गयो तब वा ओरत बोली कि आप इतना दिन के बाद आये हो तो भी चुपचाप हो क्या बात है  क्या बात है | तब वो आदमी बोलो कि मैं कुछ देर का मेहमान हूँ म्हारा बेरी दुश्मन को सही देकर आयो हूँ वो म्हारे डसेगा  उसकी औरत बहुत तेज थी उसके आदमी के तो नींद आ गई ,वह उठी और अपना बरामदा कि सात सीडी धोई और सजादी पहली पे रेत बिछाई दूसरी पर अबीर ,तीसरी पर फूल  चौथी पर केशर ,पाँचवी पर लड्डू , छठवीं पर गादी , सातवी पर दूध | इस प्रकार सात ही सीडी सजादी आधी रात को फूकरता हुआ आया पहले तो खूब  रेत में लोट लगाई और बोला कि है साहूकार के बेटा कि बहु सुख तो खूब दिया पर वचन को बाँधो हूँ डसो गो तो सही ऐसा उसने सातो ही सीडी चढतो ही गयो और बोलता गया  आगे गयो तो चौथमाता , विनायक ,और चंद्रमा तीनो मिलकर उसकी रक्षा करने लगे चौथ माता ढाल बनी , विनायकजी तलवार ,और चंद्रमाजी ने उजाला करा अब वह सर्प साहूकार के बेटा के पास जाने लगा तो विनायक जी तलवार से उसकी गरदन काट दी और ढाल से ढक दी | तब वा औरत अपना आदमी से बोली चलो अपन चौपड़ पासा खेला , अपना बेरी दुश्मन मर गया है , दोनों जना  चौपड़ पासा खेलने लगे , खेलते  खेलते बहुत देर हो गई | गाँव में बहन रहती थी वा भाई से मिलने आई तो भाई और भाभी दोनों नही उठे तब बहन बोली माँ भाई तो थका हुआ है पर भाभी को क्या हो गया वा भाई के महल में जाने लगी तो खून की नदी बह गई वा चिल्लाई कि माँ भाई को किसी ने मार डाला | बहन कि आवाज सुनकर भाभी बोली कि बाईजी हम तो ज़िंदा है हमारा बेरी दुश्मन मरा है माँ ने वहा सफाई कराकर बेटा बहु को गाजा बाजा के साथ अपने सामने बुलाया , अब सब जना एक जगह बैठ गया भाई बोल्यो माँ मेरे जाने के बाद किसी ने धर्म पुण्य करा था  तब माँ बाप बोले कि हमने कुछ नही  करा जब वा औरत  बोली कि मेने करा था सासु बोली कि मे तो  चार टाइम खाने  टाईमरोटी देती थी तब वा बोली कि आप नही मानो गा तो सबसे पूछ लो सबसे पहले पनिहारी के पास ले गई तो उसने खा हां महीने में एक बार रोटी देती थी फिर पाड़ा के पास ले गई तो  पेप का फूल निकला तीसरी बार बाड़ा में गड़ा खोदकर देखा तो सोना रूपा कि रोटी हो गई अब वा बोली कि चलो साहूकार कि दूकान पर सामान को पूछलो सासु साहूकार के पास गई हां महीने में एक बार दमड़ीका घी और गुड ले जाती थी जब वासासु बहु का पाँव पड़ने लगी |

चेल्यो को पानी मंगरे मत चढ़ाओ, 
मंगरे का पानी चेल्या में आवे है |

सासुजी में आपका पाँव लगूँ आप चौथ माता का पाँव पड़ो | हे चौथ माता बहु के टूट्या जैसे सबके टूटजो कहता,सुनता हूकारा भरता |